इस दफ़ा

इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है
हर दफ़ा हर मर्तबा ही पिछले कुछ इक साल जैसे
सिर्फ़ अपनी ही सुनाने को नहीं आओगी जानाँ

इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है
उन सभी बोसीदा बातों के गिले-शिकवे उठा के
टीस सीने में बढ़ाने को नहीं आओगी जानाँ

इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है
झूठ से भर के ठसा-ठस तोहमतों का बोझ फिर से
मेरे माथे पे गिराने को नहीं आओगी जानाँ

इस दफ़ा जब लौट के आओगी तो उम्मीद ये है
जो बची साँसें हैं मुझ में वो भी मुझ से छीन के तुम
ज़िन्दगी मेरी मिटाने को नहीं आओगी जानाँ

— Mohit Subran

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