उम्र लग-भग है अब ढही जाती
इक ख़लिश दिल में पर रही जाती
एक हद होती है कि सहने की
अब नहीं ये घुटन सही जाती
मन को भी पढ़ने की करो कोशिश
बात हर इक नहीं कही जाती
कैसे गुज़रेंगे ख़ुश्कियों के दिन
ये नमी आँख से बही जाती
तारी रहती ये बे-ख़ुदी लेकिन
ज़ेहन से मेरे आगही जाती
जो कही जा चुकी, सुनी जा चुकी
काश वो बात अन-कही जाती
बस कि नाम-ओ-निशान मिट जाए
अब कि ये चाह भी रही जाती
— Mohit Subran















