
नहीं उतरा है कब से एक क़तरा भी बयाबाँ में
कि ख़ुश्की फैलती ही जा रही है दूर मिज़्गाँ में
दिखें बहती अगर आँखें यूँ करना बहने देना तुम
बहुत मुश्किल से आती है रवानी चश्म-ए-वीराँ में
— Mohit Subran
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