किसी से भी तो निभा लेतीं जान तुम भी ना
कि घर कोई तो बचा लेतीं जान तुम भी ना
वो जिस की सैलरी पे तुम ने घूम ली दुनिया
उसे ही दुनिया बना लेतीं जान तुम भी ना
उठाए सद
में तुम्हारी हयात के जिस ने
बस उस का थैला उठा लेतीं जान तुम भी ना
वो शख़्स जिस को कि बर्बाद कर दिया तुम ने
कुछ अश्क उस को बहा लेतीं जान तुम भी ना
ये लफ़्ज़ शर्म तो तुम ने सुना ही होगा ना
इसी को गहना बना लेतीं जान तुम भी ना
— Mohit Subran















