बात जो फैली थी हू-ब-हू ही रही
दर-ब-दर घर-ब-घर कू-ब-कू ही रही
क़ीमती शय है दिल फिर से देता किसे
तू ही पहले थी याँ बा'द तू ही रही
ला नहीं पाया अंजाम तक हिज्र को
वस्ल की आरज़ू, आरज़ू ही रही
खो दिया जान कर पहले तो एक शख़्स
उम्र-भर उस की फिर जुस्तुजू ही रही
साल-दर-साल से घर की सूरत वही
हाव-हू रहती थी हाव-हू ही रही
— Mohit Subran














