bharat ke upkaar ko maan rahe sab log | भारत के उपकार को, मान रहे सब लोग

  - Divy Kamaldhwaj

भारत के उपकार को, मान रहे सब लोग
रोग 'घटाने' के लिए, दिया विश्व को 'योग'

  - Divy Kamaldhwaj

Bimari Shayari

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    पूरी कायनात में एक कातिल बीमारी की हवा हो गई
    वक्त ने कैसा सितम ढाया कि दूरियाँ ही दवा हो गयीं
    Unknown
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    हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ
    आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूँ दख़्ल दे कोई
    Jaun Elia
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    कुछ तबीयत में उदासी भी हुआ करती है
    हर कोई इश्क़ का मारा हो, ज़रूरी तो नहीं
    Jaani Lakhnavi
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    ये मुझे नींद में चलने की जो बीमारी है
    मुझ को इक ख़्वाब-सरा अपनी तरफ़ खींचती है
    Shahid Zaki
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    इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
    दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया
    Mirza Ghalib
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    करता नहीं ख़याल तेरा इस ख़याल से
    तंग आ गया अगर तू मेरी देखभाल से

    चल मेरे साथ और तबीयत की फ़िक्र छोड़
    दो मील दूर है मेरा घर अस्पताल से
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    Tehzeeb Hafi
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    तुम इस ख़मोश तबीअत पे तंज़ मत करना
    वो सोचता है बहुत और बोलता कम है
    Nawaz Deobandi
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    कभी हँसता हूँ तो आँखे कभी मैं नम भी रखता हूँ
    हर इक मुस्कान के पीछे हज़ारों ग़म भी रखता हूँ

    शिफ़ा भी दे नहीं सकता मुझे कोई मेरा अपना
    नतीजन मैं मिरे ज़ख्मों का ख़ुद मरहम भी रखता हूँ
    Read Full
    Shubham Dwivedi
    इस मरज़ से कोई बचा भी है
    चारागर इश्क़ की दवा भी है
    Unknown
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    चारागरी की बात किसी और से करो
    अब हो गए हैं यारो पुराने मरीज़ हम
    Shuja Khawar
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As you were reading Shayari by Divy Kamaldhwaj

    रंग को मलने से ही रौनक़ नइँ आती
    हर इक नुस्ख़ा यार किताबी होता है

    देखो शर्माना भी बहुत ज़रूरी है
    शर्माने से रंग गुलाबी होता है
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    Divy Kamaldhwaj
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    मोहब्बत का ज़माना चल रहा है
    वफ़ा लेकिन अभी तक ग़ुमशुदा है

    सुना है दोस्त मेरा ख़ुश बहुत है
    सुना है इश्क़ में बिल्कुल नया है

    किसी से दिल लगाए नइ लगाए
    मोहब्बत एक ज़ाती मसअला है

    कहाँ मानेंगे दीवाने किसी की
    कहाँ इनपर किसी का बस चला है

    नई पीढ़ी का फैशन है सो हमको
    सभी को 'ब्रो' बुलाना पड़ रहा है
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    Divy Kamaldhwaj
    धीरे धीरे कुछ भी आसाँ नहीं होता
    धीरे धीरे बस आदत हो जाती है
    Divy Kamaldhwaj
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    है उसके पास हीरे की अँगूठी
    हमारे पास में ग़ज़लें है जानाँ
    Divy Kamaldhwaj
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    आज फिर इज़हार करते हैं सनम
    आपसे ही प्यार करते हैं सनम

    आपको क्या इश्क़ से परहेज़ है
    आप क्यों इनकार करते हैं सनम
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    Divy Kamaldhwaj
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