ras un aankhoñ ka hai kehne ko zaraa sa paani | रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी

  - Arzoo Lakhnavi

रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी
सैंकड़ों डूब गए फिर भी है इतना पानी

आंख से बह नहीं सकता है भरम का पानी
फूट भी जाएगा छाला तो न देगा पानी

चाह में पाऊं कहाँ आस का मीठा पानी
प्यास भड़की हुई है और नहीं मिलता पानी

दिल से लौका जो उठा आंख से टपका पानी
आग से आज निकलते हुए देखा पानी

किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
झूम कर आई घटा टूट के बरसा पानी

फैलती धूप का है रूप लड़कपन का उठान
दोपहर ढलते ही उतरेगा ये चढ़ता पानी

टिकटिकी बांधे वो तकते हैं मैं इस घात में हूँ
कहीं खाने लगे चक्कर न ये ठहरा पानी

ये पसीना वही आंसू हैं जो पी जाते थे हम
'आरज़ू' लो वो खुला भेद वो टूटा पानी

  - Arzoo Lakhnavi

Aankhein Shayari

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