जो उन को लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना
    हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे न क्यूँकर शराब-ए-आरिज़
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    मुझ से बिगड़ गए तो रक़ीबों की बन गई
    ग़ैरों में बट रहा है मिरा ए'तिबार आज
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    वो बुत परी है निकालें न बाल-ओ-पर ता'वीज़
    हैं दोनों बाज़ू पे इस के इधर उधर ता'वीज़

    वो हम नहीं जो हों दीवाने ऐसे कामों से
    किसे पिलाते हो पानी में घोल कर ता'वीज़

    उठेगा फिर न कलेजे में मीठा मीठा दर्द
    अगर लिखे मिरे दिल पर तिरी नज़र ता'वीज़

    कहाँ वो लोग कि जिन के अमल का शोहरा था
    कुछ इस ज़माने में रखता नहीं असर ता'वीज़

    पिलाया साँप को पानी जो मन निकाल लिया
    नहाने बैठे हैं चोटी से खोल कर ता'वीज़

    वहाँ गया जो कोई दिल ही भूल कर आया
    रखे हैं गाड़ के उस ने इधर उधर ता'वीज़

    पस-ए-फ़ना भी मोहब्बत का सिलसिला न मिटा
    तिरे गले में है और मेरी क़ब्र पर ता'वीज़

    ये भेद है कि न मुर्दे डरें फ़रिश्तों से
    बना के क़ब्र बनाते हैं क़ब्र पर ता'वीज़

    ये क्या कि ज़ुल्फ़ में रक्खा है बाँध कर मिरा दिल
    उसे भी घोल के पी जाओ जान कर ता'वीज़

    जो चाँद से हैं बदन हैं वो चाँद तारों में
    गुलों में हैकलें हैकल के ता-कमर ता'वीज़

    हुए हैं हज़रत-ए-'माइल' भी दिल में अब क़ाइल
    कुछ ऐसा लिखती है ऐ जाँ तिरी नज़र ता'वीज़
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    क्या रोज़-ए-हश्र दूँ तुझे ऐ दाद-गर जवाब
    आमाल-नामे का तो है पेशानी पर जवाब

    रुक रुक के हँस के यूँ ही तो दे फ़ित्ना-गर जवाब
    देता है और लुत्फ़ मुझे तेरा हर जवाब

    किस से मिसाल दूँ तिरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
    उम्र-ए-तवील-ए-ख़िज़्र है इक मुख़्तसर जवाब

    मुश्किल के वक़्त दिल ही से कुछ मशवरा करें
    क्यूँ दें किसी को ग़ैर से हम पूछ कर जवाब

    करते हैं सज्दा नक़्श-ए-क़दम को तमाम लोग
    है ख़ाना-ए-ख़ुदा का तिरी रहगुज़र जवाब

    मुनकिर-नकीर पूछते हैं डाँट डाँट कर
    हों मुंतशिर हवास तो क्या दे बशर जवाब

    ख़ुल्द-ओ-सक़र के बीच में है कोई इश्क़-ए-यार
    है पुल-सिरात का ये मिरी रहगुज़र जवाब

    क्यूँ सर झुका रहा है ज़रा आँख तो मिला
    देगी मिरे सवाल का तेरी नज़र जवाब

    ग़ुस्से में यूँ न आओ कि ग़ुस्सा हराम है
    तुम बात ही से बात का दो सोच कर जवाब

    ज़र्रों की तरह ख़ाक में हैं आशिक़ों के दिल
    गर तू करे सवाल तो दे रहगुज़र जवाब

    मैं ने किया सलाम तो चिलमन में छुप गए
    दर-पर्दा देगी अब निगह-ए-पर्दा-दर जवाब

    हंगामा हश्र का सिफ़त-ए-गर्द रह गया
    तेरे ख़िराम का न हुआ फ़ित्ना-गर जवाब

    क्या अपने भोले-पन से कहें दम में आए हो
    हर बात का जो देते हो अब सोच कर जवाब

    क्या होगा ख़ाक हो के सर-ए-चर्ख़ जाएगा
    ये ज़ेर-ए-पा सवाल वो बाला-ए-सर जवाब

    लिक्खा है मुझ को हो गया तेरा लहू सफ़ेद
    मैं भी लिखूँगा ख़ून से सर फोड़ कर जवाब

    बेहोश कर के पूछते हो दिल का मुद्दआ'
    देता भी है हुज़ूर कहीं बे-ख़बर जवाब

    ग़ुस्से से कुछ कहूँ तो वो किस तरह चुप रहे
    इक बात का जो शाम से दे ता-सहर जवाब

    चितवन से ताड़ जाते हैं 'माइल' का मुद्दआ'
    दिल में इधर सवाल है लब पर उधर जवाब
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    कोई हसीन है मुख़्तार-ए-कार-ख़ाना-ए-इश्क़
    कि ला-मकाँ ही की चौखट है आस्ताना-ए-इश्क़

    निगाहें ढूँढ रही हैं दिल-ए-यगाना-ए-इश्क़
    इशारे पूछ रहे हैं कहाँ है ख़ाना-ए-इश्क़

    फिरेंगे हश्र में गर्द-ए-दिल-ए-यगाना-ए-इश्क़
    करेंगे पेश-ए-ख़ुदा हम तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-इश्क़

    नई सदा हो नए होंठ हों नया लहजा
    नई ज़बाँ से कहूँ गर कहूँ फ़साना-ए-इश्क़

    जो मौलवी हैं वो लिक्खेंगे कुफ़्र के फ़तवे
    सुनाऊँ सूरत-ए-मंसूर अगर तराना-ए-इश्क़

    अगर लगे तो लगे चोट मेरे नाले की
    अगर पड़े तो पड़े दिल पे ताज़ियाना-ए-इश्क़

    जो डाल दें उसे पत्थर पे भी फले-फूले
    दरख़्त-ए-तूर बने सब्ज़ हो के दाना-ए-इश्क़

    तुम्हीं कहो जो लुटा दें तो कौन ख़ाली हो
    ख़ज़ाना हुस्न का अफ़्ज़ूँ है या ख़ज़ाना-ए-इश्क़

    वो रात आए कि सर तेरा ले के बाज़ू पर
    तुझे सुलाऊँ बयाँ कर के मैं फ़साना-ए-इश्क़

    वो दर तक आते नहीं दर से हम नहीं उठते
    उधर बहाना-ए-हुस्न और इधर बहाना-ए-इश्क़

    सिखाई किस ने ये रफ़्तार मेरे नाले को
    कमर की तरह लचकता है ताज़ियाना-ए-इश्क़

    किसी को प्यार करेगा शबाब में तू भी
    तिरे भी घर में जलेगा चराग़-ए-ख़ाना-ए-इश्क़

    जो ख़ुश-नवीस मिले कोई देंगे दिल अपना
    हम इस किताब में लिखवाएँगे फ़साना-ए-इश्क़

    गए हैं वो मिरी महफ़िल में भूल कर रूमाल
    ये जा-नमाज़ बिछा कर पढ़ूँ दोगाना-ए-इशक़

    किसी के हुस्न ने काफ़िर बना दिया 'माइल'
    लगा के क़श्क़ा-ए-दुर्द-ए-शराब-ख़ाना-ए-इश्क़
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    शब-ए-माह में जो पलंग पर मिरे साथ सोए तो क्या हुए
    कभी लिपटे बन के वो चाँदनी कभी चाँद बन के जुदा हुए

    हुए वक़्त-ए-आख़िरी मेहरबाँ दम-ए-अव्वलीं जो ख़फ़ा हुए
    वो अबद में आ के गले मिले जो अज़ल में हम से जुदा हुए

    ये इलाही कैसा ग़ज़ब हुआ वो समाए मुझ में तो क्या हुए
    मिरा दिल बने तो तड़प गए मिरा सर बने तो जुदा हुए

    चले साथ साथ क़दम क़दम कोई ये न समझा कि हैं बहम
    कभी धूप बन के लिपट गए कभी साया बन के जुदा हुए

    अभी हैं ज़माने से बे-ख़बर रखा हाथ रक्खे ये लाश पर
    उठो बस उठो कहा मान लो मिरी क्या ख़ता जो ख़फ़ा हुए

    हैं अजीब मुर्ग़-ए-शिकस्ता-पर न चमन में घर न क़फ़स में घर
    जो गिरे तो साया हैं ख़ाक पर जो उठे तो मौज-ए-हवा हुए

    वो अरक़ अरक़ हुए जिस घड़ी मुझे उम्र-ए-ख़िज़्र अता हुई
    शब-ए-वस्ल क़तरे पसीने के मिरे हक़ में आब-ए-बक़ा हुए

    कभी शक्ल-ए-आइना रू-ब-रू कभी तूती और कभी गुफ़्तुगू
    कभी शख़्स बन के गले मिले कभी अक्स बन के जुदा हुए

    न तजल्लियाँ हैं न गर्मियाँ न शरारतें हैं न फुर्तियाँ
    हमा-तन थे दिन को तो शोख़ियाँ हमा-तन वो शब को हया हुए

    मिरे नाले हैं कि अज़ल अबद तिरे इश्वे हैं कि लब-ए-मसीह
    वहाँ कुन का ग़लग़ला वो बने यहाँ क़ुम की ये जो सदा हुए

    गिरे ज़ात में तो है जुमला-ऊस्त उठे जब सिफ़त में हमा-अज़-दस्त
    कहा कौन हो तो मिले रहे कहा नाम क्या तो जुदा हुए

    किए उस ने बज़्म में शो'बदे मली मेहंदी हाथ पे शम्अ' के
    जो पतंगे रात को जल गए वो तमाम मुर्ग़-ए-हिना हुए

    मिरे दिल के देखो तो वलवले कि हर एक रंग में जा मिली
    जो घटे तो उन का दहन बने जो बढ़े तो अर्ज़-ओ-समा हुए

    वही फ़र्श-ओ-अर्श-नशीं रहे हुए नाम अलग जो कहीं रहे
    गए दैर में तो सनम बने गए ला-मकाँ तो ख़ुदा हुए

    जो तसव्वुर उन का जुदा हुआ दिल बे-ख़बर ने ये दी सदा
    अभी हम-बग़ल थे किधर गए अभी गोद में थे वो क्या हुए

    कभी सोज़िशें कभी आफ़तें कभी रंजिशें कभी राहतें
    मिलीं चार हम को ये नेअ'मतें तिरे इश्क़ में जो फ़ना हुए

    हमें शौक़ ये कि हो एक तौर उसे ज़ौक़ ये कि हो शक्ल और
    बने आग तो बुझे आब में मिले ख़ाक में तो हवा हुए

    गए सर से जबकि वो ता-कमर तो अलिफ़ इधर का हुआ उधर
    तिरा जोड़ा खुलते ही बाल सब पस-ए-पुश्त आ के बला हुए

    कोई दब गया कोई मर गया कोई पिस गया कोई मिट गया
    तिरे इश्वे से जब से फ़लक बने तिरे ग़म्ज़े जब से क़ज़ा हुए

    मुझे गुदगुदी से ग़श आ गया तो हिला के शाना यही कहा
    अभी हँसते थे अभी मर गए अभी क्या थे तुम अभी क्या हुए

    कहो काफ़िरों से करें ख़ुशी कि ये मसअला है तनासुख़ी
    मिरे नाले ख़ाक में जब मिले तो सुबू के दस्त-ए-दुआ हुए

    पस-ए-वस्ल हम जो सरक गए तो वो खिलखिला के फड़क गए
    कहा शोख़ियों ने चलो हटो कि हुज़ूर तुम से ख़फ़ा हुए

    तुम्हें लोग कहते हैं नौजवाँ कि हो बीस तीस के दरमियाँ
    कहो मुझ से 'माइल'-ए-ख़ुश-बयाँ वो तुम्हारे वलवले क्या हुए
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    आफ़्ताब आए चमक कर जो सर-ए-जाम-ए-शराब
    रिंद समझें कि है सादिक़ सहर-ए-जाम-ए-शराब

    सब के हाथों पे था शब-भर सफ़र-ए-जाम-ए-शराब
    हर ख़त-ए-दस्त बना रह-गुज़र-ए-जाम-ए-शराब

    दुख़्तर-ए-रज़ पे गिरें मस्त पतंगों की तरह
    शम-ए-महफ़िल हो ये लख़्त-ए-जिगर-ए-जाम-ए-शराब

    थाम ले दस्त-ए-सुबू आए जो चलने में लचक
    ख़त-ए-बग़दाद हो मू-ए-कमर-ए-जाम-ए-शराब

    तूर-ए-सीना का गुमाँ हो ख़ुम-ए-मय पर सब को
    इस तरह होश उड़ाओ असर-ए-जाम-ए-शराब

    साग़र-ए-मय में नहीं परतव-ए-ख़ाल-ए-साक़ी
    है कफ़-ए-दुख़्तर-ए-रज़ में सिपर-ए-जाम-ए-शराब

    ख़ाक मय-ख़ाने की बन जाती क़यामत पिस कर
    हर क़दम पर जो लचकती कमर-ए-जाम-ए-शराब

    आज मय-नोशों का मजमा' है कहाँ ऐ साक़ी
    कौन सी बज़्म में है शोर-ओ-शर-ए-जाम-ए-शराब

    जितने मय-ख़्वार हैं साक़ी से गले मिलते हैं
    सहर-ए-ईद बनी है ख़बर-ए-जाम-ए-शराब

    शीशा-ए-मय से उड़ा काग कबूतर की तरह
    नामा पहुँचाने चला नामा-बर-ए-जाम-ए-शराब

    मौज-ए-सहबा पे गिरा सपना-ए-मीना उड़ कर
    है मिरे सामने तेग़-ओ-सिपर-ए-जाम-ए-शराब

    मय पिलाता है अगर ढाँप ले सीना साक़ी
    तेरे जोबन को लगेगी नज़र-ए-जाम-ए-शराब

    आफ़्ताब आ के सिखाता है चलन शब-भर का
    रात को होता है अक्सर गुज़र-ए-जाम-ए-शराब

    दस्त-ए-साक़ी में रहे दस्त-ए-क़दह-कश में रहे
    गर्दन-ए-शीशा-ए-सहबा कमर-ए-जाम-ए-शराब

    मस्त करते हैं दो-आलम को यही दो ख़ुद-मस्त
    लज़्ज़त-ए-नग़मा-ए-मुतरिब असर-ए-जाम-ए-शराब

    क्या ग़ज़ब है कि तिरा होंठ न चूसे 'माइल'
    और हो तेरे लबों तक गुज़र-ए-जाम-ए-शराब
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    जुम्बिश में ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़
    गर्दिश में चश्म-ए-सेहर-ए-फ़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    आरिज़ पे ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़
    हैं आज दो सूरज-गहन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    मतलब इशारों से कहा मैं इन इशारों के फ़िदा
    आँखें भी हैं गर्म-ए-सुख़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    जिस दम सिकंदर मर गया हाल-ए-तही-दस्ती खुला
    थे हाथ बैरून-ए-कफ़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    जाएगा दो हो कर ये दिल आधा इधर आधा उधर
    खींचेगी ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    ग़ैरों से खेल खेलो न तुम कर देंगे रुस्वा हश्र में
    हैं दो फ़रिश्ते जान-ए-मन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    आरिज़ पे सिमटे ख़ुद-ब-ख़ुद ज़ुल्फ़ों के घूँगर वाले बाल
    है नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    शीरीं का ख़्वाहाँ हश्र में ख़ुसरव भी है फ़रहाद भी
    खींचेंगे दोनों पैरहन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    घूंगट जो गालों से उठा तार-ए-नज़ारा जल गया
    सूरज थे दो जल्वा-फ़िगन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    क़ातिल इधर जर्राह उधर मैं नीम-बिस्मिल ख़ाक पर
    इक तीर-ए-कश इक तीर-ए-ज़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    आँखों के अंदर जाए ग़ैर आँखों के ऊपर है नक़ाब
    ख़ल्वत में हैं दो अंजुमन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    वो हाथा-पाई हम ने की बिस्तर पे टूटे और गिरे
    बाज़ू के दोनों नव-रतन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    पेश-ए-ख़ुदा रोज़-ए-जज़ा मैं भी हूँ चुप क़ातिल भी चुप
    गोया खड़े हैं बे-दहन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    रुख़्सार पर ख़त का निशाँ गुल पर हुआ सब्ज़ा अयाँ
    हैं दोनों आरिज़ दो चमन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    काफ़िर भी हूँ मोमिन भी हूँ जलना भी है गड़ना भी है
    खींचेंगे शैख़-ओ-बरहमन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    घबरा न जाएँ दिल-जिगर है बंद तुर्बत में हवा
    पंखे हों दो नज़्द-ए-कफ़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    यारब उठूँ जब क़ब्र से दो बुत रहें हम-रह मिरे
    ग़ारत-गर-ए-हिन्द-ओ-दकन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    कहते हैं अनमोल उस को सब कहते हैं कुछ गोल उस को सब
    क्या चीज़ है ऐ जान-ए-मन एक इस तरफ़ एक उस तरफ़

    जन्नत की हूरें आईं हैं 'माइल' दबाने मेरे पाँव
    बैठी हैं नज़दीक-ए-कफ़न एक इस तरफ़ एक उस तरफ़
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    महशर में चलते चलते करूँगा अदा नमाज़
    पढ़ लूंगा पुल-सिरात पे 'माइल' क़ज़ा नमाज़

    सर जाए उम्र भर की हो यारब अदा नमाज़
    आए मिरी क़ज़ा तो पढ़ूँ मैं क़ज़ा नमाज़

    माँगी नजात हिज्र से तो मौत आ गई
    रोज़े गले पड़े जो छुड़ाने गया नमाज़

    देखो कि फँस न जाएँ फ़रिश्ते भी जाल में
    क्यूँ पढ़ रहे हो खोल के ज़ुल्फ़-ए-रसा नमाज़

    हर इक सुतून ख़ाना-ए-शर-ए-शरीफ़ है
    रोज़ा हो या ज़कात हो या हज हो या नमाज़

    ये क्यूँ ख़मीदा है सिफ़त-ए-साहब-ए-रुकू
    क्या पढ़ रही है दोश पे ज़ुल्फ़-ए-दोता नमाज़

    निय्यत जो बाँध ली तो चला मैं हुज़ूर में
    रहबर मिरी नमाज़ मिरी रहनुमा नमाज़

    साक़ी क़याम से ये जो आया रूकूअ' में
    शीशा ख़ुदा के ख़ौफ़ से पढ़ता है क्या नमाज़

    उठ उठ के बैठ बैठ के करता है क्यूँ ग़ुरूर
    ज़ाहिद कहीं बढ़ाए न तेरी रिया नमाज़

    अरकान याद हैं मुझे ऐ दावर-ए-जज़ा
    गर हुक्म हो तो सामने पढ़ लूँ क़ज़ा नमाज़

    शैतान बन गया है फ़रिश्ता ग़ुरूर से
    क्या फ़ाएदा हुआ जो पढ़ी जा-ब-जा नमाज़

    ले जाते हैं मुझे सू-ए-दोज़ख़ कशाँ कशाँ
    रोज़े मिरे इधर हैं उधर है क़ज़ा नमाज़

    हक़्क़-उल-यक़ीं का नाम उरूज-ए-मक़ाम है
    पढ़ते हैं औलिया सर-ए-दोश-ए-हवा नमाज़

    मस्जिद में पाँच वक़्त दुआ वो भी वस्ल की
    'माइल' बुतों के वास्ते पढ़ते हो क्या नमाज़
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    प्यार अपने पे जो आता है तो क्या करते हैं
    आईना देख के मुँह चूम लिया करते हैं

    वस्ल का लुत्फ़ मुझे वस्ल से पहले ही मिला
    जब कहा यार ने घबरा के ये क्या करते हैं

    इस क़दर था मुझे उल्फ़त में भरोसा उन पर
    की जफ़ा भी तो ये समझा कि वफ़ा करते हैं

    है यही अर्ज़ ख़ुदा से कि फुलाँ बुत मिल जाए
    वही अच्छे जो नमाज़ों में दुआ करते हैं

    लब किसी के जो हिले कान उधर ध्यान उधर
    दिल लगा कर वो मिरा ज़िक्र सुना करते हैं

    सुबह को देख के आईने में बोसे का निशाँ
    मुस्कुराते हुए होंटों में गिला करते हैं

    कैसे कैसे मुझे बे-साख़्ता मिलते हैं ख़िताब
    ग़ुस्सा आता है तो क्या क्या वो कहा करते हैं

    क्या हुआ मुझ को रक़ीबों ने अगर दी ताज़ीम
    तेरी महफ़िल में तो फ़ित्ने ही उठा करते हैं

    कान बातों की तरफ़ आँख है कामों की तरफ़
    हो के अंजान मिरा ज़िक्र सुना करते हैं

    चीन पेशानी पे है मौज-ए-तबस्सुम लब में
    ऐसे हँसमुख हैं कि ग़ुस्से में हँसा करते हैं

    बस तो चलता नहीं कुछ कह के उन्हें क्यूँ हों ज़लील
    हम तो अपना ही लहू आप पिया करते हैं

    इस इशारे के फ़िदा ऐसे तजाहुल के निसार
    मार कर आँख वो मुँह फेर लिया करते हैं

    जलसे ही जलसे हैं जब से वो हुए ख़ुद-मुख़्तार
    कोई इतना नहीं कहता कि ये क्या करते हैं

    आशिक़ाना है अक़ीदा भी हमारा 'माइल'
    ले के हम नाम-ए-बुताँ ज़िक्र-ए-ख़ुदा करते हैं
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    Ahmad Husain Mail
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