क्या रोज़-ए-हश्र दूँ तुझे ऐ दाद-गर जवाब

आमाल-ना
में का तो है पेशानी पर जवाब

रुक रुक के हँस के यूँ ही तो दे फ़ित्ना-गर जवाब
देता है और लुत्फ़ मुझे तेरा हर जवाब

किस से मिसाल दूँ तिरी ज़ुल्फ़-ए-दराज़ को
उम्र-ए-तवील-ए-ख़िज़्र है इक मुख़्तसर जवाब

मुश्किल के वक़्त दिल ही से कुछ मशवरा करें
क्यूँ दें किसी को ग़ैर से हम पूछ कर जवाब

करते हैं सज्दा नक़्श-ए-क़दम को तमाम लोग
है ख़ाना-ए-ख़ुदा का तिरी रहगुज़र जवाब

मुनकिर-नकीर पूछते हैं डाँट डाँट कर
हों मुंतशिर हवा से तो क्या दे बशर जवाब

ख़ुल्द-ओ-सक़र के बीच में है कोई इश्क़-ए-यार
है पुल-सिरात का ये मिरी रहगुज़र जवाब

क्यूँ सर झुका रहा है ज़रा आँख तो मिला
देगी मिरे सवाल का तेरी नज़र जवाब

ग़ुस्से में यूँ न आओ कि ग़ुस्सा हराम है
तुम बात ही से बात का दो सोच कर जवाब

ज़र्रों की तरह ख़ाक में हैं आशिक़ों के दिल
गर तू करे सवाल तो दे रहगुज़र जवाब

मैं ने किया सलाम तो चिलमन में छुप गए
दर-पर्दा देगी अब निगह-ए-पर्दा-दर जवाब

हंगामा हश्र का सिफ़त-ए-गर्द रह गया
तेरे ख़िराम का न हुआ फ़ित्ना-गर जवाब

क्या अपने भोले-पन से कहें दम में आए हो
हर बात का जो देते हो अब सोच कर जवाब

क्या होगा ख़ाक हो के सर-ए-चर्ख़ जाएगा
ये ज़ेर-ए-पा सवाल वो बाला-ए-सर जवाब

लिक्खा है मुझ को हो गया तेरा लहू सफ़ेद
मैं भी लिखूँगा ख़ून से सर फोड़ कर जवाब

बेहोश कर के पूछते हो दिल का मुद्दआ'
देता भी है हुज़ूर कहीं बे-ख़बर जवाब

ग़ुस्से से कुछ कहूँ तो वो किस तरह चुप रहे
इक बात का जो शाम से दे ता-सहर जवाब

चितवन से ताड़ जाते हैं 'माइल' का मुद्दआ'
दिल में इधर सवाल है लब पर उधर जवाब

— Ahmad Husain Mail

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