sukhun thode hi man khaati hai andar se | सुख़न थोड़े ही मन खाती है अंदर से

  - Saahir

सुख़न थोड़े ही मन खाती है अंदर से
हम ऐसों को घुटन खाती है अंदर से

मैं वो हूँ जिसको बातें काट नइँ पाती
मगर तेरी छुअन खाती है अंदर से

जो तितली शान तेरे बाग की है वो
हक़ीक़त में चमन खाती है अंदर से

कि उसकी बे-लिबासी बद-चलन नइँ है
कि उसको पैरहन खाती है अंदर से

वो मेरे हाथ में आके नहीं आया
लकीरें अंजुमन खाती है अंदर से

हुई थी जो हमारे दरमियाँ में दोस्त
मुझे वो ख़ुश-सुख़न खाती है अंदर से

है तन्हाई बला ऐसी कि जो साहिर
सभी का तन-बदन खाती है अंदर से

  - Saahir

Titliyan Shayari

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