सुख़न थोड़े ही मन खाती है अंदर से
हम ऐसों को घुटन खाती है अंदर से
मैं वो हूँ जिसको बातें काट नइँ पाती
मगर तेरी छुअन खाती है अंदर से
जो तितली शान तेरे बाग की है वो
हक़ीक़त में चमन खाती है अंदर से
कि उसकी बे-लिबासी बद-चलन नइँ है
कि उसको पैरहन खाती है अंदर से
वो मेरे हाथ में आके नहीं आया
लकीरें अंजुमन खाती है अंदर से
हुई थी जो हमारे दरमियाँ में दोस्त
मुझे वो ख़ुश-सुख़न खाती है अंदर से
है तन्हाई बला ऐसी कि जो साहिर
सभी का तन-बदन खाती है अंदर से
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