ham tumhaari jaalsazi par nahin roye | हम तुम्हारी जालसाज़ी पर नहीं रोए

  - Saahir

हम तुम्हारी जालसाज़ी पर नहीं रोए
हमको रोना था सहेली पर नहीं रोए

हमने कंधा चाहा था उसने हथेली दी
एक ज़िद थी हम हथेली पर नहीं रोए

एक पत्थर रह गया था मेरे सीने में
आप की हर चीज टूटी पर नहीं रोए

जो चुने है 'इश्क़ उनको इक हिदायत है
कोई अपनी पाएमाली पर नहीं रोए

मय पिलाने पर आ जाने थे मेरे आँसू
दोस्त ने काफ़ी पिलाई पर नहीं रोए

आग से कह पानी बनने की न सोचे वो
जलने दे अब मोमबत्ती पर नहीं रोए

मैं उसे ख़ुश देखकर रोऊंगा सो कल वो
देख मुझको मुस्कुराई पर नहीं रोए

भूखे सोए पानी पी कर मुफ़लिसी काटी
पर किसी की भी हवेली पर नहीं रोए

तेरे रोने पर भी रोने वाले हमने बाद
तेरे अपनी मौत देखी पर नहीं रोए

  - Saahir

Sharaab Shayari

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