Saahir
Saahir
Ghazal

चुप कराता है संसार का दुख

रोता हूँ जब मैं बेकार का दुख

छत को सर पे उठा रक्खा है पर
कौन पूछे है दीवार का दुख

बा'द छह दिन के इतवार आना
ढोना छह दिन है इतवार का दुख

आइए बैठिए तब कहीं फिर
पूछिये आप बीमार का दुख

है असल में जुदाई का डर जो
लग रहा है तुम्हें प्यार का दुख

मियान में आँसू देखे लगा तब
क़ैद है इस
में तलवार का दुख

फ़ायदे की जगह घाटा होना
है नहीं ये ही व्यापार का दुख

उभरा उभरा ये काग़ज़ बताए
उतरा है इक क़लमकार का दुख

इक तवायफ़ ने हँसकर के देखा
छिप गया फिर से बाजार का दुख

चाहता हूँ कि मैं रोऊँ तुझ में
चाहिए मुझ को अब यार का दुख

चुप करा के मुझे रोने वाली
का निकल आया घरबार का दुख

चुन सही शख़्स को वरना होगा
उम्र भर एक इज़हार का दुख

रूठ जाना मनाना नहीं बस
ये नहीं होता तक़रार का दुख

तुम को हाँ हो ख़ुदा करना ऐसा
तुम नहीं जानो इनकार का दुख

— Saahir

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