mujhko hi waqt jo deta tha tha kabhi | मुझको ही वक़्त जो देता था, था कभी

  - Saahir

मुझको ही वक़्त जो देता था, था कभी
'इश्क़ में मैं भी था मुब्तिला, था कभी

शे'र तस्वीरों से कहता था, था कभी
एक चेहरे को शब भर लिखा, था कभी

उस तरफ़ क्यूँ नहीं जाते हो आजकल
वो तो घर जाने का रास्ता, था कभी

यार जुगनू, मोहब्बत रहें तितलियाँ
'इश्क़ में एक ये क़ायदा, था कभी

'इश्क़ नुक़सान है कहने वाले बता
'इश्क़ नुक़सान या फ़ायदा, था कभी

आँख में रहने वाले बता सकते थे
आँख में घर किसी का बना था, कभी

देख के ख़ुद को रोता हूँ मैं आजकल
आइना मुझको अच्छा लगा, था कभी

क़ैस का सुनके ये सोचता हूँ मैं अब
हाल वैसा मेरा क्या हुआ, था कभी

पानी में तैरता है ये जो ख़ुद-ब-ख़ुद
पानी में ज़िस्म ये डूबता, था कभी

  - Saahir

Mohabbat Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Saahir

As you were reading Shayari by Saahir

Similar Writers

our suggestion based on Saahir

Similar Moods

As you were reading Mohabbat Shayari Shayari