Saahir
Saahir
Ghazal

ढूँढ़ते हो जिसे तुम यहाँ रौशनी में

खो गया है वहीं पे कहीं तीरगी में

जिस तरह साथ में हम अभी हैं नहीं थे
इक दफ़ा फ़ासला भी रहा दोस्ती में

इश्क़ करना सभी से मिले जो भी तन्हा
ये सिखाया गया है मुझे ज़िंदगी में

एक लड़की का दिल टूटा है फिर कहीं पर
एक लड़का कहीं उतरा है शा'इरी में

कोई मुझ को पढ़े और रोए सो मैं ने
ख़ुद को ही क़ैद कर रक्खा है डाइरी में

— Saahir

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