mohabbat ka m'aani jab khula aahista aahista | मोहब्बत का म'आनी जब खुला आहिस्ता आहिस्ता

  - Saahir

मोहब्बत का म'आनी जब खुला आहिस्ता आहिस्ता
कमी का मुझको अंदाज़ा हुआ आहिस्ता आहिस्ता

दिखाई देती है वो हर तरफ़ मुझको मुसलसल तौर
मुसलसल आती है उसकी सदा आहिस्ता आहिस्ता

इकठ्ठे रहते थे पहले पहल दुनिया में अहल-ए-बैत
किया ज़र और ज़मीनों ने जुदा आहिस्ता आहिस्ता

इसी डर खिड़कियों दरवाज़ों को खोला नहीं मैंने
कि मरने लगता है घर का दिया आहिस्ता आहिस्ता

कि इक तो पूरी शब बाक़ी है ऊपर से तेरी आवाज़
सो तू अपनी कहानी को सुना आहिस्ता आहिस्ता

कई दिल तोड़ने वाली भी मुझ सेे 'इश्क़ करती हैं
वो मुझ सेे सीख जाती हैं वफ़ा आहिस्ता आहिस्ता

ज़ियादा देर तक टिकता नहीं है झूठ पर कुछ भी
यक़ीनन सच का लगता है पता आहिस्ता आहिस्ता

रखें उनवान क्या कछुए से वाबस्ता कहानी का
किसी ने ज़ोर से इतना कहा "आहिस्ता आहिस्ता"

अज़िय्यत चाहिए मुझको यही मेरी गुज़ारिश है
गला जल्लादों मेरा काटना आहिस्ता आहिस्ता

ज़रा देरी हुई लेकिन मिली मंज़िल उसे 'साहिर'
मुसाफ़िर जो मुसलसल था चला आहिस्ता आहिस्ता

  - Saahir

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