Saahir
Saahir
Ghazal

साथ में वो किसी को नज़र आ गया तो

और इस कशमकश में ही घर आ गया तो

तुम मुझे देख जैसे नज़र फेरती हो
दिल तुम्हारे इसी नखरे पर आ गया तो

क्या कहा रंग चढ़ता नहीं है किसी का
हाँ मगर तुम पे मेरा असर आ गया तो?

वो जिसे तुम ने भेजा है मालूम करने
वो भी वापस यहाँ बे-ख़बर आ गया तो?
सठ दफ़्तर से सारे पते जानता है
ढूँढ़ते ढूँढ़ते मेरे घर आ गया तो

गाँव से शहर को जोड़ तो दूँ सड़क से
वो मगर बीच कोई शजर आ गया तो?

हाथ रखना जरा तंग देते हुए इश्क़
वो ज़ियादा कहीं बाँट कर आ गया तो ?

इश्क़ बचपन में ये सोच कर के किया था
जो जवानी में ऐसा सफ़र आ गया तो

— Saahir

More by Saahir

Other ghazal from the same pen

See all from Saahir →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling