Saahir
Saahir
Ghazal

आशिक़ी में जीत जाने का सहारा भी हो सकता है

उस की आँखों की नमी कोई दिखावा भी हो सकता है

उस की ख़्वाहिश पूरी करने को सितारों टूट जाओ अब
आसमानों में चमकना तो दुबारा भी हो सकता है

या'नी सब कुछ तुमपे निर्भर है कि तुम कैसे हो उस के साथ
उस का लहजा पल में ही मीठे से ख़ारा भी हो सकता है

मुझ को उस का तो पता है उस को मैं ही सब से प्यारा हूँ,
मेरा क्या है मुझ को कोई और प्यारा भी हो सकता है।

छोड़ने का फ़ैसला क्यूँ कर लिया तुम ने अकेले ही,
दोस्त ऐसे फ़ैसलों में इश्तिशारा भी हो सकता है।

कर रहे हो आशिक़ी तुम फ़ायदे का सोच कर साहिर,
दो मुँही तलवार है इस
में ख़सारा भी हो सकता है।

— Saahir

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