mas'ala hota hai ye bhi khudkushi ka | मसअला होता है ये भी ख़ुदकुशी का

  - Saahir

मसअला होता है ये भी ख़ुदकुशी का
ख़त्म ग़म होता नहीं है हर किसी का

धीरे धीरे 'इश्क़ चढ़ना तीसरी का
है बताता जाना तय है दूसरी का

रस्सियाँ हैं और पंखें भी हैं घर में
है नहीं सामान पर ये खुदकुशी का

नाम राधे श्याम लेती क्यूँ है दुनिया
प्यार झूठा तो नहीं था रुक्मणी का

दोस्त से जब मांगे पैसे मैने तब वो
दे रहा था झांसा मुझको मुफ़लिसी का

लड़कियों को जानना भी सहल होता
'इश्क़ में होता अ
गर डर उस छड़ी का

सोचता हूँ बैठके दफ़्तर में हर दिन
मैं कोई नौकर नहीं हूँ दफ़्तरी का

नौकरी को गाली देता है वो लड़का
हाँ वो जो मारा हुआ है नौकरी का

मैं दवा तो ढूंढ लूँगा 'इश्क़ तेरी
रास्ता मिल जाए पहले वापसी का

तुमको कुछ मालूम है तो फ़िर बताओ
कोई चारासाज़ है क्या दिल-लगी का

आरज़ू है एक अनजाने शहर में
हाथ पकड़े घूमूँ मैं इक अजनबी का

ताज को तुम 'इश्क़ की मानो निशानी
मानता हूँ जादू मैं कारीगरी का

जो हसीना हमको हँसकर देखती है
उस हसीना को पता है तिश्नगी का

एक बेटा मंदिरों में बैठता है
काम करता एक बेटा मौलवी का

मुझ
में से बदबू नहीं आएगी लेकिन
काम करता हूँ मैं यारों गंदगी का

  - Saahir

Udasi Shayari

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