लटकती लाश कहती है
कि मैंने ख़ुदकुशी की है
कुएँ में लटका हूँ मैं और
किसी ने रस्सी फेंकी है
बगीचा थोड़े है ये दोस्त
गुलों भँवरों की बस्ती है
मेरी हँसती हुई तस्वीर
अकेले ख़ूब रोती है
बुना है उसको यूँँ जैसे
ख़ुदा ने शायरी की है
लकीरों पर भरोसा है
हाँ, मेरी ही हथेली है
तेरी तस्वीर है जिस पर
वही दीवार रिसती है
बताओ लड़की क्या है दोस्त
न सुलझे वो पहेली है
ग़ज़ल मेरी, ग़ज़ल के साथ
मोहब्बत है, सहेली है
जिसे मतले में ढूँढा था,
वो तो मक्ते में रहती है
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