Saahir
Saahir
Ghazal

लटकती लाश कहती है

कि मैं ने ख़ुद-कुशी की है

कुएँ में लटका हूँ मैं और
किसी ने रस्सी फेंकी है

बगीचा थोड़े है ये दोस्त
गुलों भँवरों की बस्ती है

मेरी हँसती हुई तस्वीर
अकेले ख़ूब रोती है

बुना है उस को यूँ जैसे
ख़ुदा ने शा'इरी की है

लकीरों पर भरोसा है
हाँ, मेरी ही हथेली है

तेरी तस्वीर है जिस पर
वही दीवार रिसती है

बताओ लड़की क्या है दोस्त
न सुलझे वो पहेली है

ग़ज़ल मेरी, ग़ज़ल के साथ
मोहब्बत है, सहेली है

जिसे मतले में ढूँढा था,
वो तो मक्ते में रहती है

— Saahir

More by Saahir

Other ghazal from the same pen

See all from Saahir →

Best Love Shayari Collection

Shers of best love shayari collection.

All Best Love Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling