करम तेरा ख़ुदा हम पर ये तेरी ही ख़ुदाई है

तेरा दीदार नामुमकिन तभी तो मांँ बनाई है

बनाया भी है वालिद के लिए जन्नत का दरवाज़ा
मगर पैरों तले मांँ के ये जन्नत भी बनाई है

कभी रातों में जब भी जाग कर मैं रोने लगता था
तभी उठकर मुझे मांँ ने कोई लोरी सुनाई है

मैं इतना ख़ूब-सूरत तो नहीं पर मांँ को लगता हूँ
हुआ बीमार तो कहती नज़र किस ने लगाई है

मँगाई एक रोटी थी वो दो ले कर चली आई
मेरी मांँ तो अभी तक भी न गिनती सीख पाई है

लगा कमज़ोर जो भाई माँ उस के पास जा बैठी
मैं सब से छोटा था लेकिन वो उस के हिस्से आई है

बड़ी ही दूर रहता हूँ अनीस उस शहर-ए-मक्का से
मुकम्मल हो गया अब हज मेरी मांँ मुस्कुराई है

— Anis shah anis

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