अजी अंदर बहुत अंदर चुभा है
तुम्हारी बातों का नश्तर चुभा है
नहीं नींद आती है रातों में हम को
इन आँखों में कोई मंज़र चुभा है
बिछा ली याद क्या हम ने तुम्हारी
बदन में काँटों सा बिस्तर चुभा है
मिला इन'आम हम को दोस्ती का
ये देखो पीठ पर ख़ंजर चुभा है
अनीस इन आँसुओं पर तुम न जाना
हमारी आँख में कंकर चुभा है
— Anis shah anis















