तेरी शोख़ी में क़ुदरत के ये सारे राज़ पलते हैं
अदा तेरी जो बदले तो नज़ारे ख़ुद बदलते हैं
ज़रा दिल में उठे जज़्बात का तूफ़ाँ सँभालो तुम
ये मौजें सर पटकती हैं समुंदर भी मचलते हैं
बहारें फिर से लौट आई हैं इस वीराँ गुलिस्ताँ में
तेरे तेवर की लर्ज़िश से ये मौसम भी बदलते हैं
बरस जाता है सावन भी बड़ी ही बे-क़रारी से
मेरे महबूब की आँखों से जब आँसू निकलते हैं
जो देखीं सिलवटें बिस्तर पे उन के ये लगा मुझ को
मैं ही तन्हा नहीं वो भी तो अब करवट बदलते हैं
सदा ही सीख देती हैं ये तेरी कोशिशें हम को
मिलेंगी मंज़िलें उन को जो गिरकर भी सँभलते हैं
हुआ हमराह जब से ये 'अनीस' इन राहों में तेरी
ये दुनिया रश्क करती है दिवाने हाथ मलते हैं
— Anis shah anis















