जवाँ है जिस्म रूह पर निढाल है कमाल है
लहू में क्यूँ नहीं तेरे उबाल है कमाल है
भरा हुआ है वादों से ये थाल है कमाल है
मगर न इस में रोटी है न दाल है कमाल है
ये दाने साफ़ दिख रहे हैं इन परिंदों को मगर
जो दिख नहीं रहा इन्हें वो जाल है कमाल है
ग़रीब का छुआ हुआ हराम है हुज़ूर को
मगर ग़रीब का लहू हलाल है कमाल है
जिसे हमारी इक ख़ुशी भी देखना मुहाल था
हमारी मौत पर उसे मलाल है कमाल है
तुम्हारी बद ज़ुबानी पर तो मुतमईन हैं सभी
हमारी नेक बात पर बवाल है कमाल है
हम अपने इक सवाल के जवाब के थे मुंतजिर
सवाल के जवाब में सवाल है कमाल है
सुना है ग़मजदा बहुत हैं वो हमारे हाल पर
उन्हें हमारी फ़िक्र है ख़याल है कमाल है
दरख़्तों ने लिबास-ए-बर्ग-ओ-गुल उतारे है 'अनीस'
ख़िज़ाँ की रुत भी मौसम-ए-विसाल है कमाल है















