कुछ इस तरह से मेरा इम्तिहान लेते हैं
वफ़ा परखने में वो मेरी जान लेते हैं
परिंदे अपनी कभी जब उड़ान लेते हैं
कमान अपनी ये सय्याद तान लेते हैं
मेरे ही क़त्ल की तफ़्तीश कर रहे हैं और
मेरी ही उँगलियों के वो निशान लेते हैं
गुनाह कोई कहीं भी हो गर ज़माने में
गुनाहगार वो हम को ही मान लेते हैं
ख़ुलूस-ओ-अम्न-ओ-मुहब्बत की फ़स्ल बोते हम
इसीलिए तो वो हम से लगान लेते हैं
कभी भड़कते जो शो'ले 'अनीस' नफ़रत के
तो ज़द में अपनी हमारा मकान लेते हैं
— Anis shah anis















