अपनी आँखों को धो रहा हूँ मैं
तुम को लगता है रो रहा हूँ मैं
सींचना है इन्हें पसीने से
ख़्वाब कुछ दिल में बो रहा हूँ मैं
कौन कमबख़्त पी रहा है शराब
बस ग़मों को डुबो रहा हूँ मैं
हक़ बयानी तुम्हें यूँ लगती है
जैसे नश्तर चुभो रहा हूँ मैं
इतनी तादाद है फ़राइज़ की
भीड़ में इन की खो रहा हूँ मैं
और सर पर मेरे बढाओ नहीं
कैसे ये वज़्न ढो रहा हूँ मैं
रोज़ बढती 'अनीस' मँहगाई
रोज़ ही छोटा हो रहा हूँ मैं
— Anis shah anis















