हो गये सैय्याद के सब डर में क़ैद
ख़ुद परिंदे हो गये पिंजर में क़ैद
क़ैदियों सी ज़िंदगी हम जी रहे
घर से निकले हो गये दफ़्तर में क़ैद
उस ख़ुदा ने ही बनाया आदमी
कर दिया इसने ख़ुदा पत्थर में क़ैद
वो ज़माने से बचाता फिर रहा
एक वालिद की है जाँ दुख़्तर में क़ैद
इक सुख़नवर का सुख़न भी ख़ूब है
कर दिया सागर को इक गागर में क़ैद
तख़्त-ओ-ताज़-ओ-शान-ओ-शौकत, माल-ओ-ज़र
सब क़लंदर की हैं इक ठोकर में क़ैद
था हसीं मंज़र सो हमने यूँँ किया
कर लिया मंज़र वो इक पिक्चर में क़ैद
ये तेरी ज़ुल्फें हैं या ज़ंजीर हैं
हम तो इन
में हो गये पल भर में क़ैद
वो 'अनीस' इंसाँ नहीं शैतान हैं
आपदा करते हैं जो अवसर में क़ैद
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