दाग़ मोमिन मीर-ओ-ग़ालिब की दुआ लेता हूँ मैं
ख़ुद को कुछ अशआर इनके जो सुना लेता हूँ मैं
शाइरी है इक समंदर थाह ले सकता नहीं
हाँ हुनर इतना तो है गोता लगा लेता हूँ मैं
ख़ूब है ये भी तरीक़ा ख़ुद सँवरने के लिए
रोज़ ही बस आईना ख़ुद को दिखा लेता हूँ मैं
इस तरह बहला लिया करता हूँ अपने दिल को अब
कुछ परिंदों को फ़क़त दाना चुगा लेता हूँ मैं
अब ज़रूरत ही नहीं काग़ज़ क़लम की दोस्तो
जब ख़याल आता है मोबाइल उठा लेता हूँ मैं
जब कभी तन्हाई मुझको घेर लेती है 'अनीस'
अपने दिल में उस घड़ी महफ़िल सजा लेता हूँ मैं
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