ho gaye saiyyaad ke sab dar men qaid | हो गये सैय्याद के सब डर में क़ैद

  - Anis shah anis

हो गये सैय्याद के सब डर में क़ैद
ख़ुद परिंदे हो गये पिंजर में क़ैद

क़ैदियों सी ज़िंदगी हम जी रहे
घर से निकले हो गये दफ़्तर में क़ैद

उस ख़ुदा ने ही बनाया आदमी
कर दिया इसने ख़ुदा पत्थर में क़ैद

वो ज़माने से बचाता फिर रहा
एक वालिद की है जाँ दुख़्तर में क़ैद

इक सुख़नवर का सुख़न भी ख़ूब है
कर दिया सागर को इक गागर में क़ैद

तख़्त-ओ-ताज़-ओ-शान-ओ-शौकत, माल-ओ-ज़र
सब क़लंदर की हैं इक ठोकर में क़ैद

था हसीं मंज़र सो हमने यूँँ किया
कर लिया मंज़र वो इक पिक्चर में क़ैद

ये तेरी ज़ुल्फें हैं या ज़ंजीर हैं
हम तो इन
में हो गये पल भर में क़ैद

वो 'अनीस' इंसाँ नहीं शैतान हैं
आपदा करते हैं जो अवसर में क़ैद

  - Anis shah anis

Ghar Shayari

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