सितम करो तुम या ज़ुल्म ढाओ सहूँगा सब बे-ज़बान हूँ मैं
मुझे सभी कहते अन्नदाता किसान हूँ हाँ किसान हूँ मैं
कभी है सूखा कभी है बारिश कभी है बिजली की ये कटौती
कटे परों का मैं हूँ परिंदा कि उसकी झूठी उड़ान हूँ मैं
कभी उठाई जो बात हक़ की मिली है लाठी चली है गोली
दिए हुकूमत ने ज़ख़्म दिल पर तो इसके रुख़ पर निशान हूँ मैं
भँवर में भावों के मैं फँसा हूँ न छोर मेरी मुसीबतों का
अगर मैं डूबा तो तुम भी डूबो तुम्हारा अब इम्तिहान हूँ मैं
लगी है क़र्ज़ों से होड़ मेरी कभी हराया कभी मैं हारा
गले लगा मौत सो गया हूँ सफ़र की गहरी थकान हूँ मैं
ये कैमरे को मेरी तरफ़ भी ज़रा घुमाओ सवाल पूछो
जवाब हूँ हर सवाल का मैं चुनाव तेरा रुझान हूँ मैं
चलो उठो एक हो लड़ो अब नहीं है कोई अनीस अपना
सियासी फ़िरक़ों में मुझको बाँटा कि जैसे उनकी दुकान हूँ मैं
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