आप रुख़ पर नक़ाब रखते हैं
अब्र में माहताब रखते हैं
तुम को साए में धूप लगती है
सर पे हम आफ़्ताब रखते हैं
शौक़ से कीजिए जफ़ा हम पर
हम कहाँ अब हिसाब रखते हैं
तल्ख़ लहजा है आप का फिर भी
लब पे हम जी जनाब रखते हैं
आप पत्थर उछालिए बे-शक
हाथ में हम गुलाब रखते हैं
शाइ'री आप भी किया कीजे
शौक़ तो ये नवाब रखते हैं
चुभते हो जो 'अनीस' आँखों में
हम कहाँ ऐसे ख़्वाब रखते हैं
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