shabo roz ki chaakri zindagi ki | शबो रोज़ की चाकरी ज़िन्दगी की

  - Aman G Mishra

शबो रोज़ की चाकरी ज़िन्दगी की
मयस्सर हुईं रोटियाँ दो घड़ी की

नहीं काम आएँ जो इक दिन मशीनें
ज़रूरत बने आदमी आदमी की

कि कल शाम फ़ुरसत में आई उदासी
बता दी मुझे क़ीमतें हर खुशी की

किया क्या अमन जी ने बाइस बरस में
कभी जी लिया तो कभी ख़ुदकुशी की

ग़मों को ठिकाने लगाते लगाते
घड़ी आ गयी आदमी के ग़मी की

ये सारी तपस्या का कारण यही है
मिसालें बनें तो बनें सादगी की

  - Aman G Mishra

Depression Shayari

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