Akhtar Hoshiyarpuri

Akhtar Hoshiyarpuri

@akhtar-hoshiyarpuri

Akhtar Hoshiyarpuri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhtar Hoshiyarpuri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

क्या लोग हैं कि दिल की गिरह खोलते नहीं आँखों से देखते हैं मगर बोलते नहीं — Akhtar Hoshiyarpuri
'अख़्तर' गुज़रते लम्हों की आहट पे यूँँ न चौंक इस मातमी जुलूस में इक ज़िंदगी भी है — Akhtar Hoshiyarpuri
क्या लोग हैं कि दिल की गिरह खोलते नहीं आँखों से देखते हैं मगर बोलते नहीं — Akhtar Hoshiyarpuri

Ghazal

शिकारी रात भर बैठे रहे ऊँची मचानों पर मुसाफ़िर फिर भी लौट आने को जा पहुँचे ठिकानों पर किसी ने झाँक कर देखा न बाहर ही कोई आया हवा ने उम्र भर क्या क्या न दस्तक दी मकानों पर ख़ुद अपना अक्स-ए-रुख़ है जो किसी को रोक ले बढ़ कर वगर्ना आदमी कब मुस्तक़िल ठहरा चटानों पर उठाए आसमाँ के दुख भी किस में इतनी हिम्मत है ज़मीं ही एक भारी है हमें तो अपनी जानों पर दरीचों ने ये मंज़र आज पहली बार देखा है कि तुम जाने कहाँ थे और सूरज था मकानों पर घरों से जब निकल आए तो सब ने राह ली अपनी मगर दुनिया की नज़रें हैं परिंदों की उड़ानों पर हवा यूँँ ही तो हम को ले के पेड़ों तक नहीं आई हमारा नाम था लिक्खा हुआ गंदुम के दानों पर ये माना आँधियों का हक़ है सब पर यूरिशें करना मगर ये मैं कि मेरी आँख है ख़स्ता मकानों पर कुछ इतने हो गए मानूस सन्नाटों से हम 'अख़्तर' गुज़रती है गिराँ अपनी सदा भी अब तो कानों पर — Akhtar Hoshiyarpuri
तिलिस्म-ए-गुम्बद-ए-बे-दर किसी पे वा न हुआ शरर तो लपका मगर शोला-ए-सदा न हुआ हमें ज़माने ने क्या क्या न आइने दिखलाए मगर वो अक्स जो आईना-आशना न हुआ बयाज़-ए-जाँ में सभी शे'र ख़ूब-सूरत थे किसी भी मिसरा-ए-रंगीं का हाशिया न हुआ न जाने लोग ठहरते हैं वक़्त-ए-शाम कहाँ हमें तो घर में भी रुकने का हौसला न हुआ वो शहर आज भी मेरे लहू में शामिल है वो जिस से तर्क-ए-त'अल्लुक़ को इक ज़माना हुआ यही नहीं कि सर-ए-शब क़यामतें टूटीं सहर के वक़्त भी इन बस्तियों में क्या न हुआ मैं दश्त-ए-जाँ में भटक कर ठहर गया 'अख़्तर' फिर इस के बा'द मिरा कोई रास्ता न हुआ — Akhtar Hoshiyarpuri
पहले तो सोच के दोज़ख़ में जलाता है मुझे फिर वो शीशे में मिरा चेहरा दिखाता है मुझे शायद अपना ही तआक़ुब है मुझे सदियों से शायद अपना ही तसव्वुर लिए जाता है मुझे बाहर आवाज़ों का इक मेला लगा है देखो कोई अंदर से मगर तोड़ता जाता है मुझे यही लम्हा है कि मैं गिर के शिकस्ता हो जाऊँ सूरत-ए-शीशा वो हाथों में उठाता है मुझे जिस्म मिनजुमला-ए-आशोब-ए-क़यामत ठहरा देखूँ कौन आ के क़यामत से बचाता है मुझे ज़लज़ला आया तो दीवारों में दब जाऊँगा लोग भी कहते हैं ये घर भी डराता है मुझे कितना ज़ालिम है मिरी ज़ात का पैकर 'अख़्तर' अपनी ही साँस की सूली पे चढ़ाता है मुझे — Akhtar Hoshiyarpuri
शाम तन्हाई धुआँ उठता बराबर देखते फिर सर-ए-शब चाँद उभरने का भी मंज़र देखते जुम्बिश-ए-लब में मिरी आवाज़ की तस्वीर है काश वो भी बोलते लफ़्ज़ों के पैकर देखते साहिलों पर सीपियाँ थीं और हवा का शोर था पानियों में डूबते तो कोई गौहर देखते खिड़कियों की ओट से अंदाज़ा हो सकता नहीं शहर का अहवाल तुम घर से निकल कर देखते आने वालों के लिए दरवाज़े रहते हैं खुले जाने वाले भी कभी मुड़ कर सू-ए-दर देखते बारिशों में भीगना जिस्मों का उजला बाँकपन रास्तों की गर्द भी ये लोग सर पर देखते वो जिन्हें दस्तार की हसरत रही है उम्र भर मेरे शानों पर कभी 'अख़्तर' मिरा सर देखते — Akhtar Hoshiyarpuri
अपने क़दमों ही की आवाज़ से चौंका होता यूँँ मिरे पास से हो कर कोई गुज़रा होता चाँदनी से भी सुलग उठता है वीराना-ए-जाँ ये अगर जानते सूरज ही को चाहा होता ज़िंदगी ख़्वाब-ए-परेशाँ है बहार एक ख़याल इन को मिलने से बहुत पहले ये सोचा होता दोपहर गुज़री मगर धूप का आलम है वही कोई साया किसी दीवार से उतरा होता रेत उड़ उड़ के हवाओं में चली आती है शहर-ए-अरमाँ सर-ए-सहरा न बसाया होता आरज़ू उम्र-ए-गुरेज़ाँ तो नहीं तुम तो नहीं ये सरकता हुआ लम्हा कहीं ठहरा होता पीछे पीछे कोई साया सा चला आता था हाए वो कौन था मुड़ कर उसे देखा होता तुझ से यक गो न तअ'ल्लुक़ मुझे इक उम्र से था ज़िंदगी तू ने ही बढ़ कर मुझे रोका होता जाने क्या सोच के लोगों ने बुझाए हैं चराग़ रात कटती तो सहर होती उजाला होता अपने दामन को जला कर मैं चराग़ाँ करता अगर इस राख में 'अख़्तर' कोई शो'ला होता — Akhtar Hoshiyarpuri
बजा कि दुश्मन-ए-जाँ शहर-ए-जाँ के बाहर है मगर मैं उस को कहूँ क्या जो घर के अंदर है तमाम नक़्श परिंदों की तरह उतरे हैं कि काग़ज़ों पे खिले पानियों का मंज़र है मैं एक शख़्स जो कुम्बों में रह गया बट कर मैं मुश्त-ए-ख़ाक जो तक़्सीम हो के बे-घर है शजर कटा तो कोई घोंसला कहीं न रहा मगर इक उड़ता परिंदा फ़ज़ा का ज़ेवर है वो ख़ौफ़ है कि मकीं अपने अपने कमरों में हैं वो हाल है कि बयाबाँ में वुस'अत-ए-दर है कहीं भी पेड़ नहीं फिर भी पत्थर आए हैं गली में कोई नहीं फिर भी शोर-ए-महशर है मैं इस वसीअ जज़ीरे में वाहिद इंसाँ हूँ कि मेरे चारों तरफ़ दश्त का समुंदर है कोई भी ख़्वाब न ऊँची फ़सील से उतरा मगर किरन के गुज़रने को रौज़न-ए-दर है तमाम रौशनियाँ बुझ गई हैं बस्ती में मगर वो दीप कि जिस का हवाओं में घर है किसी से मुझ को गिला क्या कि कुछ कहूँ 'अख़्तर' कि मेरी ज़ात ही ख़ुद रास्ते का पत्थर है — Akhtar Hoshiyarpuri
गए ज़माने की सूरत बदन चुराए वो नई रुतों की तरह से भी मुस्कुराए वो हज़ार मेरी नफ़ी भी करे वो मेरा है कि मेरे होने का एहसास भी दिलाए वो हर एक शख़्स यहाँ अपने दिल का मालिक है मैं लाख उस को बुलाऊँ मगर न आए वो हवा की आहटें सुनता हूँ धड़कनों की तरह मिसाल-ए-शम्अ मुझे रात-भर जगाए वो मिरे बदन को लहू-रंग पैरहन भी दे मिरी क़बास मिरे ज़ख़्म भी छुपाए वो मिरी रगों का लहू बिंत-ए-अम से मिलता है मैं अपना आप भी देखूँ तो याद आए वो तमाम रात गुज़ारी है किर्चियाँ चुनते सहर हुई तो नया आइना दिखाए वो मिरा वजूद किताबों में हर्फ़ हर्फ़ हुआ ख़ुदा करे मिरी आवाज़ बन के आए वो वो एक शो'ला-ए-जव्वाला जो छुए जल जाए मगर ख़ुद अपने ही साए से ख़ौफ़ खाए वो ये क्या कि मुझ को छुपाया है मेरी नज़रों से कभी तो मुझ को मिरे सामने भी लाए वो मैं अपने आप से निकला तो सामने वो था और अब ये सोच रहा हूँ कहीं को जाए वो पलट चुका हूँ वरक़ ज़िंदगी के ऐ 'अख़्तर' हरीम-ए-शब में दबे पाँव फिर भी आए वो — Akhtar Hoshiyarpuri
होंटों पे क़र्ज़-ए-हर्फ़-ए-वफ़ा उम्र भर रहा मक़रूज़ था सो चुप की सदा उम्र भर रहा कुछ दर-गुज़र की उन को भी आदत न थी कभी कुछ मैं भी अपनी ज़िद पे उड़ा उम्र भर रहा वो तजरबे हुए कि मिरे ख़ूँ की ख़ैर हो यारो मैं अपने घर से जुदा उम्र भर रहा मौसम का हब्स शब की सियाही फ़सील-ए-शहर मुजरिम था सर झुकाए खड़ा उम्र भर रहा सुब्ह ओ मसा की गर्दिश-ए-पैहम के बावजूद मैं दरमियान-ए-सुब्ह-ओ-मसा उम्र भर रहा इन बारिशों में कौन बहे ख़ार-ओ-ख़स के साथ सूरज की ले के सर पे रिदा उम्र भर रहा हाथों से ओट की तो सभी उँगलियाँ जलीं फिर भी हवा की ज़द पे दिया उम्र भर रहा इक ख़ून की ख़लीज मिरे सामने रही और मेरे पीछे साया मिरा उम्र भर रहा 'अख़्तर' ये जंगलों में उसी के निशान हैं जो ख़ार ख़ार आबला-पा उम्र भर रहा — Akhtar Hoshiyarpuri
दर्द की दौलत-ए-नायाब को रुस्वा न करो वो नज़र राज़ है उस राज़ का चर्चा न करो वुसअ'त-ए-दश्त में दीवाने भटक जाते हैं दोस्तो आहु-ए-रम-ख़ुर्दा का पीछा न करो तुम मुक़द्दर का सितारा हो मिरे पास रहो तुम जबीन-ए-शब-ए-नमनाक पे उभरा न करो पस-ए-दीवार भी दीवार का आलम होगा तुम यूँँही रौज़न-ए-दीवार से झाँका न करो घर पलट आने में आफ़ियत-ए-जाँ है यारो जब हवा तेज़ चले राह में ठहरा न करो या दिल-ओ-दीदा को तनवीर-ए-मोहब्बत बख़्शो या दम-ए-सुब्ह ज़माने में उजाला न करो ये जहान-ए-गुज़राँ हाथ किसे आया है पीछे मुड़ मुड़ के किसी शख़्स को देखा न करो भागते लम्हे को कब रोक सका है कोई वो तो इक साया है साए की तमन्ना न करो सर सलामत नहीं रहते हैं ज़बाँ कटती है पत्थरों को कभी भूले से भी सज्दा न करो प्यास बुझती है कहाँ तपते बयाबानों की मिरी आँखों मिरी आँखों यूँँही बरसा न करो ज़ीस्त है तेज़-क़दम आगे निकल जाएगी तुम किसी मोड़ पे रुकने का इरादा न करो कुछ इधर साए हैं जो बढ़ के लिपट जाते हैं 'अख़्तर' इस राह से हो कर कभी गुज़रा न करो — Akhtar Hoshiyarpuri
था एक साया सा पीछे पीछे जो मुड़ के देखा तो कुछ नहीं था अब अपनी सूरत को देखता हूँ कभी जो सद-पैकर-आफ़रीं था वो फिर भी जाँ से अज़ीज़-तर था तबीअ'तें गो जुदा जुदा थीं अगरचे हम-ज़ाद भी नहीं था वो मेरा हम-शक्ल भी नहीं था मैं रुक सकूँगा ठहर सकूँगा थकन सफ़र की मिटा सकूँगा कहीं तो कोई शजर मिलेगा तमाम रस्ते यही यक़ीं था कई चटानें गुदाज़ जिस्मों में अपनी गर्मी से ढल गई थीं बुतों के क़िस्से में तेशा-कारों का तज़्किरा भी कहीं कहीं था न जाने क्या धुँद दरमियाँ थी कि कोहकन की नज़र न पहुँची जहाँ से फूटा था चश्मा-ए-माह-शब का पत्थर भी तो वहीं था मैं अपनी आवाज़ के तआक़ुब में मावरा-ए-नज़र भी पहुँचा मगर पलट कर न उस ने पूछा कि मैं ख़ला के बहुत क़रीं था वही मनाज़िर लुटे लुटे से वही शिकस्ता मकान 'अख़्तर' मैं रोज़-मर्रा के रास्ते से जो घर में पहुँचा बहुत हज़ीं था — Akhtar Hoshiyarpuri
यक-ब-यक मौसम की तब्दीली क़यामत ढा गई रुक के सुस्ताना था जब मुझ को कड़ी धूप आ गई दिन ढले किस को है तज्दीद-ए-सफ़र का हौसला आती जाती रहगुज़र नाहक़ मुझे बहका गई बू-ए-गुल मौज-ए-हवा है और हवा क्यूँँकर रुके अब के मिट्टी ही की ख़ुशबू मेरा घर महका गई वो हवाएँ हैं उड़े जाते हैं पैराहन यहाँ ऐ उरूस-ए-ज़ीस्त तू क्यूँँ घर से बाहर आ गई ये हवा आई कहाँ से इस से मैं वाक़िफ़ न था मेरे घर में जो चराग़ों का धुआँ फैला गई वो घटा फिर इस तरफ़ से लौट कर गुज़री नहीं सूखी धरती को जो दरिया का पता बतला गई ज़िंदगी मर्ग-ए-तलब तर्क-ए-तलब 'अख़्तर' न थी फिर भी अपने ताने-बाने में मुझे उलझा गई — Akhtar Hoshiyarpuri
ख़्वाब-महल में कौन सर-ए-शाम आ कर पत्थर मारता है रोज़ इक ताज़ा काँच का बर्तन हाथ से गिर कर टूटता है मकड़ी ने दरवाज़े पे जाले दूर तलक बुन रक्खे हैं फिर भी कोई गुज़रे दिनों की ओट से अंदर झाँकता है शोर सा उठता रहता है दीवारें बोलती रहती हैं शाम अभी तक आ नहीं पाती कोई खिलौने तोड़ता है अव्वल-ए-शब की लोरी भी कब काम किसी के आती है दिल वो बचा अपनी सदा पर कच्ची नींद से जागता है अंदर बाहर की आवाज़ें इक नुक़्ते पर सिमटी हैं होता है गलियों में वावेला मेरा लहू जब बोलता है मेरी साँसों की लर्ज़िश मंज़र का हिस्सा बनती है देखता हूँ मैं खिड़की से जब शाख़ पे पत्ता काँपता है मेरे सिरहाने कोई बैठा ढारस देता रहता है नब्ज़ पे हाथ भी रखता है टूटे धागे भी जोड़ता है बादल उठे या कि न उठे बारिश भी हो या कि न हो मैं जब भीगने लगता हूँ वो सर पर छतरी तानता है वक़्त गुज़रने के हम-राह बहुत कुछ सीखा 'अख़्तर' ने नंगे बदन को किरनों के पैराहन से अब ढाँपता है — Akhtar Hoshiyarpuri
उफ़ुक़ उफ़ुक़ नए सूरज निकलते रहते हैं दिए जलें न जलें दाग़ जलते रहते हैं मिरी गली के मकीं ये मिरे रफ़ीक़-ए-सफ़र ये लोग वो हैं जो चेहरे बदलते रहते हैं ज़माने को तो हमेशा सफ़र में रहना है जो क़ाफ़िले न चलें रस्ते चलते रहते हैं हज़ार संग-ए-गिराँ हो हज़ार जब्र-ए-ज़माँ मगर हयात के चश्में उबलते रहते हैं ये और बात कि हम में ही सब्र-ओ-ज़ब्त नहीं ये और बात कि लम्हात टलते रहते हैं ये वक़्त-ए-शाम है या रब दिल ओ नज़र की हो ख़ैर कि इस समय में तो साए भी ढलते रहते हैं कभी वो दिन थे ज़माने से आशनाई थी और आईने से अब 'अख़्तर' बहलते रहते हैं — Akhtar Hoshiyarpuri