shikaari raat bhar baithe rahe unchi machaanon par | शिकारी रात भर बैठे रहे ऊँची मचानों पर

  - Akhtar Hoshiyarpuri

शिकारी रात भर बैठे रहे ऊँची मचानों पर
मुसाफ़िर फिर भी लौट आने को जा पहुँचे ठिकानों पर

किसी ने झाँक कर देखा न बाहर ही कोई आया
हवा ने 'उम्र भर क्या क्या न दस्तक दी मकानों पर

ख़ुद अपना अक्स-ए-रुख़ है जो किसी को रोक ले बढ़ कर
वगर्ना आदमी कब मुस्तक़िल ठहरा चटानों पर

उठाए आसमाँ के दुख भी किस में इतनी हिम्मत है
ज़मीं ही एक भारी है हमें तो अपनी जानों पर

दरीचों ने ये मंज़र आज पहली बार देखा है
कि तुम जाने कहाँ थे और सूरज था मकानों पर

घरों से जब निकल आए तो सब ने राह ली अपनी
मगर दुनिया की नज़रें हैं परिंदों की उड़ानों पर

हवा यूँँ ही तो हम को ले के पेड़ों तक नहीं आई
हमारा नाम था लिक्खा हुआ गंदुम के दानों पर

ये माना आँधियों का हक़ है सब पर यूरिशें करना
मगर ये मैं कि मेरी आँख है ख़स्ता मकानों पर

कुछ इतने हो गए मानूस सन्नाटों से हम 'अख़्तर'
गुज़रती है गिराँ अपनी सदा भी अब तो कानों पर

  - Akhtar Hoshiyarpuri

Good night Shayari

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