शायान-ए-ज़िंदगी न थे हम मो'तबर न थे

हाँ कम-नज़र थे इतने मगर कम-नज़र न थे

अब के बरस जो फूल खिला काग़ज़ी ही था
अब के तो दूर दूर कहीं बर्ग-ए-तर न थे

हर फूल एक ज़ख़्म था हर शाख़ एक लाश
गोया कि राह में थीं सलीबें शजर न थे

बादल उठे तो रेत के ज़र्रे बरस पड़े
हम को भिगो गए हैं वो दामन जो तर न थे

कहते थे एक जू-ए-रवाँ है चमन चमन
देखा तो बस्तियों के किनारे भी तर न थे

टकरा के सर को अपना लहू आप चाटते
अच्छा हुआ कि दश्त में दीवार-ओ-दर न थे

दरिया का सीना चीर के उभरे जो सत्ह पर
दामन में संग-रेज़े थे 'अख़्तर' गुहर न थे

— Akhtar Hoshiyarpuri

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