इक नूर था कि पिछले पहर हम-सफ़र हुआ
मुझ को क़बा का चाक ही चाक-ए-सहर हुआ
सैलाब उमँड के शहर की गलियों में आ गए
लेकिन ग़रीब-ए-शहर का दामन न तर हुआ
ज़िंदान-ए-आरज़ू में नज़र बे-बसर रही
दीवार दर हुई तो किरन का गुज़र हुआ
वो आँधियाँ चली हैं कि अश्जार उखड़ गए
दुक्कान-ए-शीशागर पे न फिर भी असर हुआ
अब कौन देखता फिरे क्यूँँ बाम-ओ-दर जले
जो कुछ हुआ है फ़स्ल-ए-चमन से उधर हुआ
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