jis brahman ne kaha hai ki ye saal achha haius ko dafnaao mere haath ki rekhaon mein | जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है

  - Qateel Shifai

जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
उस को दफ़नाओ मिरे हाथ की रेखाओं में

  - Qateel Shifai

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    क्या इस का गिला कीजे उसे प्यार ही कब था
    वो अहद-ए-फ़रामोश वफ़ादार ही कब था

    उस ने तो सदा पूजे हैं उड़ते हुए जुगनू
    वो चाँद-सितारों का परस्तार ही कब था

    हम डूब गए जागती रातों के भँवर में
    हाथ उस का हमारे लिए पतवार ही कब था

    आमों की हसीं रुत के सिवा भी तो वो कूके
    लेकिन किसी कोयल का ये किरदार ही कब था

    आवाज़ जो मैं दूँ तो किसी और को छू ले
    इस आँख-मिचोली से वो बेज़ार ही कब था

    तुम उस को बुरे नाम से यारो न पुकारो
    ये नाम उसे बाइस-ए-आज़ार ही कब था

    मशहूर-ए-ज़माना हैं 'क़तील' उस की उड़ानें
    वो दाम-ए-मोहब्बत में गिरफ़्तार ही कब था
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    Qateel Shifai
    किया है प्यार जिसे हम ने ज़िंदगी की तरह
    वो आश्ना भी मिला हम से अजनबी की तरह

    किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
    छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह

    बढ़ा के प्यास मिरी उस ने हाथ छोड़ दिया
    वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल-लगी की तरह

    सितम तो ये है कि वो भी न बन सका अपना
    क़ुबूल हम ने किए जिस के ग़म ख़ुशी की तरह

    कभी न सोचा था हम ने 'क़तील' उस के लिए
    करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह
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    Qateel Shifai
    ये मो'जिज़ा भी मोहब्बत कभी दिखाए मुझे
    कि संग तुझ पे गिरे और ज़ख़्म आए मुझे

    मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साए को
    बदन मिरा ही सही दोपहर न भाए मुझे

    ब-रंग-ए-ऊद मिलेगी उसे मिरी ख़ुश्बू
    वो जब भी चाहे बड़े शौक़ से जलाए मुझे

    मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूँ
    बरहना शहर में कोई नज़र न आए मुझे

    वही तो सब से ज़ियादा है नुक्ता-चीं मेरा
    जो मुस्कुरा के हमेशा गले लगाए मुझे

    मैं अपने दिल से निकालूँ ख़याल किस किस का
    जो तू नहीं तो कोई और याद आए मुझे

    ज़माना दर्द के सहरा तक आज ले आया
    गुज़ार कर तिरी ज़ुल्फ़ों के साए साए मुझे

    वो मेरा दोस्त है सारे जहाँ को है मा'लूम
    दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आए मुझे

    वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूँ नहीं करता
    वो बद-गुमाँ है तो सौ बार आज़माए मुझे

    मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूँ 'क़तील'
    ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाए मुझे
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    Qateel Shifai
    हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे
    अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ
    Qateel Shifai
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    गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
    हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं

    शम्अ' जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए
    हम उसी आग में गुमनाम से जल जाते हैं

    बच निकलते हैं अगर आतिश-ए-सय्याल से हम
    शोला-ए-आरिज़-ए-गुलफ़ाम से जल जाते हैं

    ख़ुद-नुमाई तो नहीं शेवा-ए-अरबाब-ए-वफ़ा
    जिन को जलना हो वो आराम से जल जाते हैं

    रब्त-ए-बाहम पे हमें क्या न कहेंगे दुश्मन
    आश्ना जब तिरे पैग़ाम से जल जाते हैं

    जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
    जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं
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    Qateel Shifai

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