नामा-बर अपना हवाओं को बनाने वाले

अब न आएँगे पलट कर कभी जाने वाले

क्या मिलेगा तुझे बिखरे हुए ख़्वाबों के सिवा
रेत पर चाँद की तस्वीर बनाने वाले

मय-कदे बन्द हुए ढूँढ़ रहा हूँ तुझ को
तू कहाँ है मुझे आँखों से पिलाने वाले

काश ले जाते कभी माँग के आँखें मेरी
ये मुसव्विर तेरी तस्वीर बनाने वाले

तू इस अन्दाज़ में कुछ और हसीं लगता है
मुझ से मुँह फेर के ग़ज़लें मेरी गाने वाले

सब ने पहना था बड़े शौक़ से काग़ज़ का लिबास
जिस क़दर लोग थे बारिश में नहाने वाले

छत बना देते हैं अब रेत की दीवारों पर
कितने ग़ाफ़िल हैं नए शहर बसाने वाले

अद्ल की तुम न हमें आस दिलाओ कि यहाँ
क़त्ल हो जाते हैं ज़ंजीर हिलाने वाले

किस को होगी यहाँ तौफ़ीक़-ए-अना मेरे बा'द
कुछ तो सोचें मुझे सूली पे चढ़ाने वाले

मर गए हम तो ये कत्बे पे लिखा जाएगा
सो गए आप ज़माने को जगाने वाले

दर-ओ-दीवार पे हसरत सी बरसती है 'क़तील'
जाने किस देस गए प्यार निभाने वाले

— Qateel Shifai

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