सुकूं के पल बिताने चाहिए थे
हमें लम्हें चुराने चाहिए थे
पहल हम कर नहीं पाए जहाँ पर
वही किस्से बढ़ाने चाहिए थे
तुम्हें जाना ही था इक दिन यहाँ से
तुम्हें तो बस बहाने चाहिए थे
उन्हीं सब वाक़यो पर रो रहे हैं
हंसी में जो उड़ाने चाहिए थे
तिरा ही फैसला था ग़म है क्यूँँ अब,
ये लब तो मुस्कुराने चाहिए थे
कहाँ तुम कुण्डली के फेर में थे
दिलों से दिल मिलाने चाहिए थे
मैं माज़ी में भटकता फिर रहा था
मुझे दिन फिर पुराने चाहिए थे
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