ज़ेहन में है मुलाक़ात तेरी
याद है आज भी बात तेरी
इत्र जैसे महक ख़ूब आती
तेज़ जब तू करे बात तेरी
याद तू ख़ूब आती मुझे ही
फिर न भूलूँ हसीं रात तेरी
क्यूँ झुकी थी तभी वो निगाहें
बेज़ुबाँ तो न थी बात तेरी
चंद लम्हें लगे सिर्फ़ मिलने
हिज्र में क्यूँ कटी रात तेरी
दूर रहके यहीं है लगे तू
कब सुनी पास से बात तेरी
अब न कोई मुलाक़ात बातें
लफ़्ज़ था
में रहें बात तेरी
देखते ही रहा ख़ामुशी से
शाम-ए-ग़म से भरी रात तेरी
ख़्वाब ऐसे मनोहर न देखे
वक़्त-बे-वक़्त बारात तेरी
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