हश्र से फूल सी ही उभरती कभी
फ़िक्र में फिर कली कोई मरती कभी
कैसे हर बार हो तेरा ही सब सही
या-ख़ुदा बोलने से ही डरती कभी
तेरे आने से ही रात होती बड़ी
वक़्त मिलता नहीं फिर संँवरती कभी
देखके हुस्न को कोई हैरान था
झूठ तारीफ़ से ही मुकरती कभी
ख़्वाहिशों से मिली छाँव सी ही ख़ुशी
धूप सी फिर ज़मीं पर उतरती कभी
चाहने मैं लगी थी तुझे उस समय
और कहने से भी ख़ूब डरती कभी
अब मनोहर धुएँ का कहें क्या हमीं
जिस्म ढल के असर मौत करती कभी
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