मुंतज़िर बात दिल की बताए कोई
ख़्वाहिशें दिल में फिर से जगाए कोई
मानते बात ही कब बड़ों की सभी
ना-समझ है उन्हें ही मनाए कोई
आस दिल में जगी दास्ताँ से तेरे
रंज कैसे तुझे फिर बताए कोई
आस्ताँ है नहीं या-ख़ुदा अब कोई
फिर तेरा ही जुनूँ ही जगाए कोई
आँख से अश्क़ ही फिर निकलते रहे
हादिसा क्या हुआ है बताए कोई
रात आख़िर उसी नाम से हो गई
हिज्र की नींद से भी जगाए कोई
राम श्री राम ही है ज़ुबाँ पर सभी
नाम से भी कोई ग़म भुलाए कोई
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