यक़ीं करो दस्तरस हमेशा हर एक को आजमा रही है
ज़मीं से फिर आसमाँ को छूने नया ही आलम बना रही है
बड़े अजीब-ओ-ग़रीब थोड़े ही दोस्त होते कोई हमारे
ये बे-बसी दोस्ती में क्यूँँ फिर से फ़ासिला ही बना रही है
शबाब बज़्म-ए-अदब में भी है वहाँ निगहबान भी होते
कि तिश्नगी ख़्वाहिशों से कैसे ये बज़्म ही फिर सजा रही है
कभी जुनूँ था मुझे भी उस ही गली से आवारगी से यारो
गली निशाँ अब दिखा रही है वो रास्ता भी बता रही है
अगर गुनहगार ही बढ़े तो वो एहतियातन कहाँ बढ़ेंगे
कई दिनों से मुझे 'मनोहर' ये बात दिल को सता रही है
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