हश्र से फूल सी ही उभरती कभी

  - Manohar Shimpi

हश्र से फूल सी ही उभरती कभी
फ़िक्र में फिर कली कोई मरती कभी

कैसे हर बार हो तेरा ही सब सही
या-ख़ुदा बोलने से ही डरती कभी

तेरे आने से ही रात होती बड़ी
वक़्त मिलता नहीं फिर संँवरती कभी

देखके हुस्न को कोई हैरान था
झूठ तारीफ़ से ही मुकरती कभी

ख़्वाहिशों से मिली छाँव सी ही ख़ुशी
धूप सी फिर ज़मीं पर उतरती कभी

चाहने मैं लगी थी तुझे उस समय
और कहने से भी ख़ूब डरती कभी

अब मनोहर धुएँ का कहें क्या हमीं
जिस्म ढल के असर मौत करती कभी

  - Manohar Shimpi

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