शब-ओ-रोज़ मिलके मुलाक़ात होगी
मिले सोच जब भी तो फिर बात होगी
छलकने से दरिया कहाँ कम हुआ है
दिली ख़ामुशी से ही बरसात होगी
कभी चल सको तो चलो साथ मेरे
किसी मोड़ पर फिर अहम बात होगी
मुझे रोज़ नीली वो आँखें बताए
फ़िज़ा के बदलते ही बरसात होगी
गुज़रते हुए दिन से भी वास्ता है
ज़रा देर ठहरो तो ख़ैरात होगी
किसी शाख़ का है वो नौ-ख़ेज़ पत्ता
उसे क्या पता दिन ढले रात होगी
खिलाड़ी कोई भी रहे वो मनोहर
सही चाल से उस पे भी मात होगी
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