तेरा कमाल बड़ा ख़ास हर हुनर से भी
रखे तुझे वो ही महफ़ूज़ हफ़-नज़र से भी
वो आब ख़ास सफ़ा है बहे रवानी से
वहाँ पे जश्न बड़ा था किसी नगर से भी
कभी समझ न सका उन हसीं निगाहों को
खुली किताब लगी तू मेरी नज़र से भी
दिल-ओ-क़रार बताए वो सिर्फ़ रुत्बा है
क़यास कम ही करे क्यूँँ कोई बशर से भी
तेरे दिमाग़-सा है तेरे शक्ल सा कहते
वो शख़्स और लगा है किसी नज़र से भी
नदी मिले न मिले है किसी समंदर से
मिलाप लहर करे आर-पार डर से भी
ये ज़ुल्म और सितम बदलने वाले हैं
जवाब झूठ 'मनोहर' मिले नज़र से भी
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