RAAHI
RAAHI
Ghazal

जश्न मैं मौत का मनाता हूँ

मैं तो मर कर भी गीत गाता हूँ

जल्दबाज़ी बहुत रही होगी,
हाँ पुरानी ग़ज़ल सुनाता हूँ

जान करती रही मुझे वा'दा,
मैं कभी भी नहीं निभाता हूँ

डगमगाता नहीं कभी सच से,
मैं न ग़लती कभी छुपाता हूँ

आख़िरी मुशायरे में हूँ
झूठ तो मैं नहीं बताता हूँ

भर रहा दिल मिरा, ग़लत जो हूँ,
आँख नम है, मगर हँसाता हूँ

सोचता जो कभी ख़ुदा से थे
आज उन को बहुत रुलाता हूँ

ये अजब लोग और ये क़िस्से
याद है , हाँ मगर भुलाता हूँ

चाह कोई नहीं मिले मुझ से
मिल के सब से जो रूठ जाता हूँ

बात मंज़िल की हो जहाँ पर भी
खु़द को 'राही' वहाँ बताता हूँ

— RAAHI

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