RAAHI

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@the_scorpio_hardwin

"RAAHI" shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in "RAAHI"'s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ज़िंदगी की सज़ा से बेहतर तो नेमत-ए-मौत ही मिली होती — RAAHI
आइना देख कर हुआ मालूम मौत से पहले मरना क्या होता — RAAHI
रात भर जागना सही नइँ है मौत अबकी तू ही सुला मुझ को — RAAHI
जब कभी हो वो सफ़र में वक़्त कटता तक नहीं है — RAAHI
सुनो, कल ईद है, तुम याद से आना गले मिल कर मुझे कहना, मुबारक हो — RAAHI
मुन्तज़िर क्यूँ किसी के हो राही ख़ुद भी अपना ख़याल रख सकते — RAAHI
आप मेरी ग़ज़ल सुनने आए हैं ना आइए बैठिए तालियाँ दीजिए — RAAHI
बड़ी नाराज़ हो तुम तो झगड़ती तक नहीं हो अब — RAAHI
कौन बर्बाद है मेरे जैसा, दर्द भी ग़म-गुसार से ही मिले — RAAHI
रश्क़ अपने ही सुख़न से क्यूँ नहीं होगा मुझे वो मुहब्बत मुझ सेे नइँ मेरे सुख़न से कर रही — RAAHI
इस तरह से तू ख़्वाब में मत आ सुब्ह से मेरे लम्स सूजे हैं — RAAHI
नाम मेरा शुरू है तेरे नाम के अंत से ये ख़ुदा का इशारा है हम दोनों के वास्ते — RAAHI
प्रेम जब भी सफ़र में रहता है ट्रेन से तेज़ धड़कनें चलती — RAAHI
बिन तुम्हारे बस यही आभास होता हो अमावस रात जैसे, पूर्णिमा में — RAAHI
जीवन में इक सरल सा ही सिद्धांत है मेरा जो राम का नहीं वो किसी काम का नहीं — RAAHI
मीर ग़ालिब अच्छे शाइ'र हैं मगर हाँ यारों के भी यार तो बस एलिया जौन — RAAHI
जाम, सिगरेट, शे'र, तुम, महफ़िल और क्या क्या नशे में है 'राही' — RAAHI
याद-दिलबर और मिसरे वक़्त के मोहताज तो नइं हम सुख़न-वर और आशिक़, इस घड़ी का क्या करेंगे — RAAHI
हो बरक़रार हुस्न पे रौनक़ शबाब और मय — RAAHI
किताब है ज़िंदगी मैं पन्ना यहाँ नया लेने आ गया हूँ सफ़र का राही मैं आपसे एक तज़रुबा लेने आ गया हूँ — RAAHI

Ghazal

मेरी शोहरत राम की है राम से है राम में है सब मुहब्बत राम की है राम से है राम में है वो तुम्हारा ये हमारा क्यूँ झगड़ना आपसी में सारी दौलत राम की है राम से है राम में है आप मैं सब क्या पता किस बात पे उलझे हुए हैं सबकी बरकत राम की है राम से है राम में है और कुछ कहना नहीं पर ये तो बोलो साथ मेरे अपनी क़िस्मत राम की है राम से है राम में है है नहीं साहस मुझे हनुमत सा छाती चीर लूँ मैं पर इबादत राम की हैं राम से हैं राम में है क्या कभी सोचा है तुम ने क्या है रामायण का निष्कर्ष सारी ज़ीनत राम की है राम से है राम में है सब सेे सुंदर बात ये है अपने अपने राम सबके जग सदारत राम की है राम से है राम में है राम के बस नाम से पत्थर नहीं डूबे नदी में सब को हिम्मत राम की है राम से है राम में है मैं ने केवल इतना जाना आज तक के तजरबे से धर्म राहत राम की है राम से है राम में है जल पवन पावक धरा अंबर मिलन से पंचतत्वों को महारत राम की है राम से है राम में है कर ज़रा उद्घोष मेरे साथ सब को तू बता दे सब रियासत राम की है राम से है राम में है — RAAHI
वही लहजा वही चेहरा नया रस्ता है दोज़ख़ का मुहब्बत और नहीं कुछ भी ये दरवाज़ा है दोज़ख़ का अगर देखे नहीं तुम ने पिता के आँख के आँसू यक़ीनन फिर तुम्हारे साथ तो पहरा है दोज़ख़ का गुज़ारी ज़िंदगी तन्हा अकेले उम्र भर हम ने कहानी सुन के लगता है जहाँ बढ़िया है दोज़ख़ का लिखा करता यहाँ जो भी फ़क़त महबूब पर ही शे'र सुख़न-वर हो नहीं सकता वो बस शोहरा है दोज़ख़ का बदन जब पहले आए ज़ुल्फ़ के तो तुम समझ लेना तुम्हारा इश्क़ और आशिक़ बना क़िस्सा है दोज़ख़ का ग़लत को दे रहे हैं वो सज़ा हर ग़लती गिन गिन कर यहाँ के लोग से मक़सद तो पाक़ीज़ा है दोज़ख़ का — RAAHI
पागलों की तरह ज़िंदगी हो गई इश्क़ से जो हमें बे-दिली हो गई आदतन हम नहीं ख़ुश रहेंगे कभी उन को हम से बिछड़ कर ख़ुशी हो गई हम को भी तो कभी प्यार की चाह थी चाह बढ़ती रही शा'इरी हो गई यूँँ बदल से गए हम जो क्या ही कहें दोस्तों से बहुत दुश्मनी हो गई दोपहर को कभी याद आते नहीं रात तो याद में सुरमई हो गई जब तलक साथ थी कुछ अलग बात थी वो गई दूर तो की़मती हो गई बढ़ रहे थे कदम जो उसी की तरफ़ वो नहीं जो मिली बेरुखी हो गई खो दिया फिर उसे अब कहाँ वो मिले कल मिली जो सनम बावली हो गई हम अदब से मिले और वो बे-अदब हम गले जो मिले वो दुखी हो गई शाम की बात थी रात भर जो चली इक छुवन से ही वापस कली हो गई आज मुझ को नहीं कोई भी तजरबा हाँ मगर राज बे-पर्दगी हो गई — RAAHI
हमारी याद से उन की बग़ावत तक नहीं होती मोहब्बत की है जब से तो शिकायत तक नहीं होती अगर आते न उस दिन वो लगा कर के अलग काजल हमारे दिल-नज़र से यूँँ शरारत तक नहीं होती मेरे कमरे में जानाँ देख सब बिखरा पड़ा है अब तेरे जाने पे मुझ सेे तो हिफ़ाज़त तक नहीं होती हमारा दिल किसी लड़की पे अब लगता कहाँ दिलबर मुहब्बत के जो मारे है मुहब्बत तक नहीं होती मगर वादे वफ़ा के तुम सभी आशिक़ से करते हो अगर तुम सा ही होता तो मुसीबत तक नहीं होती बहुत ज़्यादा तजुर्बा है तुझे आशिक़ बदलने का अगर मिलते न मुझ को तो ये ग़फ़लत तक नहीं होती बदलते हम अगर तेरी तरह हर दिन नया बिस्तर बदलते दर्द से राही को दिक़्क़त तक नहीं होती — RAAHI
ये दूरी जो है हम-नशीं ख़ूब-सूरत नहीं है, मिरा एक-तरफ़ा रहा इश्क़ ज़िल्लत नहीं है हमें एक आवाज़ तो देते जाने के पहले, या आवाज़ दे कर के जाने की आदत नहीं है कभी सोचना यार तुम भी ख़मोशी को मेरी, ग़लत; कौन बोला, तुम्हारी ज़रूरत नहीं है सुना है मुझे शहर भर करते बदनाम हो तुम, मगर हाँ, हमें तुम सेे कोई शिकायत नहीं है बता दो ज़रा इश्क़ कैसी दुआ से मिलेगी, बिना नाम उन के मिरी कोई आयत नहीं है नहीं रो सका था बिछड़ने समय मह-जबीं से, नज़र में, मिरे अश्क की कोई क़ीमत नहीं है बदल है गई, वक़्त के साथ दस्तूर दुनिया, बदलना तो 'राही' कि यारों रिवायत नहीं है — RAAHI