Prashant Arahat

Prashant Arahat

@Arahat_Prashant

Prashant Arahat shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Prashant Arahat's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

4

Content

79

Likes

428

Shayari
Audios
  • Sher(42)
  • Ghazal(32)
  • Nazm(5)

Sher

अगर शिकवा करे आ कर कभी हम से मुहब्बत में रहें बेफ़िक्र हम उस सेे हमें फिर क्या परेशानी — Prashant Arahat
मेरी ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं मेरे होंठों पे अपने होंठ रख दो — Prashant Arahat
अचानक से कहीं महफ़िल में तुम सेे रूबरू होना वहाँ मुमकिन नहीं तुम सेे कोई भी गुफ़्तुगू होना — Prashant Arahat
पिता बचपन में मिट्टी के खिलौने ला के देते थे उन्हें मालूम था आगे सबक़ ये काम आएगा — Prashant Arahat
लड़की एक मिली है मुझ को देख जिसे सब लोग कहें जिस के पीछे तुम पागल थे उस सेे दुगुनी अच्छी है — Prashant Arahat
विसाले यार होती है यहाँ हर रोज़ ख़्वाबों में तभी मिलने की अब तुम सेे कोई ख़्वाहिश नहीं होती — Prashant Arahat
रास्ते सब के सभी उस ओर ही जा कर मिले हैं ज़िंदगी ये जिस तरफ़ ले कर के जाना चाहती है — Prashant Arahat
कहाँ जा कर रहेगा ये नहीं मालूम है हम को ठिकाना सिर्फ़ मजनूँ का वही वर्षों से सहरा है — Prashant Arahat
ज़माना ढूँढ़ता रहता है भौतिक साधनों में ही मगर मुझ को बताओ ये ख़ुशी अंदर छुपाई क्यूँ — Prashant Arahat
सलीक़ा ही नहीं तुम को कोई रिश्ता निभाने का जो जाना हो चले जाओ मगर ये बे-वफ़ाई क्यूँ — Prashant Arahat
छोड़ गई है मुझ को तो इस की कोई परवाह नहीं उस सेे अच्छी लड़की से अब इश्क़ हमारा चलता है — Prashant Arahat
चॉकलेट खाकर समझ आया मुझे ये देर में स्वाद अच्छा है तिरे होंठों से अच्छा कुछ नहीं — Prashant Arahat
चलो अब चाय पीते हैं कहीं पर तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है — Prashant Arahat

Ghazal

दोस्ती को इस तरह हम सेे निभाना एक दिन घर हमारे यार अब फ़ुर्सत में आना एक दिन हम अभी गर्दिश में हैं गुमनाम हैं पर देखना खोजता हम को फिरेगा ये ज़माना एक दिन हम सुनाएँगे तुम्हें फ़ुर्सत से अपनी शा'इरी जब इरादा हो तुम्हारा घर बुलाना एक दिन यूँँ नहीं हम भी रहेंगे अब किराए पर सदा हम बनाएँगे यहीं पर आशियाना एक दिन एक ग़लती पर सभी अच्छाइयों को आप की भूल जाता है यहाँ सारा ज़माना एक दिन खोजते तुम फिर रहे हो मंदिरों में जो सुकूँ पाँव तुम माँ बाप के अपने दबाना एक दिन एक दिन आफ़त में डालेगा मुझे ये देखना नाम तेरा नींद में यूँँ बड़बड़ाना एक दिन — Prashant Arahat
उस के कंगन उस के झुमके उस की चूड़ी अच्छी है गोरे तन पर उस के फिर वो साड़ी नीली अच्छी है गाल गुलाबी नागिन ज़ुल्फ़ें चाल नदी सी क्या बोलें क्या-क्या तुम को बतलाएँ वो तो पूरी ही अच्छी है मैं ने बोला आओ चल कर हम तुम पिज़्ज़ा खाते हैं वो बोली मॉडर्न के पास में छोला पूड़ी अच्छी है उस के संग गए थे इक दिन हम कतकी के मेले में एक फ़कीर कहा था मुझ सेे बेटा जोड़ी अच्छी है अब क्या अपनी नज़्मों में उस को मैं धोखेबाज़ कहूँ उस की भी अपनी मर्ज़ी है वैसे लड़की अच्छी है इक-तरफ़ा मैं प्यार करुँ या जा कर के इनकार सुनूँ एक सुख़न-वर की ख़ातिर ये भी बेचैनी अच्छी है — Prashant Arahat
नज़र मंज़िल पे है जिन की क़दम ख़ुद ही बढ़ाते हैं वो चढ़कर आसमानों में सितारे गढ़ के आते हैं इरादे हर समय उन के सदा ही आग होते हैं वो लोहा मानकर ख़ुद को ही भट्टी में तपाते हैं बहुत दुश्वारियाँ होती हैं इन के रोज़ जीवन में तभी चुपके से जा कर ये कहीं मिलतेमिलाते हैं समर्पण इस क़दर इनका मुहब्बत में भले धोखा मिले इनको मगर ये एकतरफ़ा भी निभाते हैं भरोसा ही नहीं तुझ को हमारी इस मुहब्बत पर तो सुन ज़ालिम निकलकर अब तेरे पहलू से जाते हैं मुझे मालूम है अरहत बहुत दुख है ज़माने में तभी अब हम तेरे सजदे में सिर अपना झुकाते हैं — Prashant Arahat
दोस्ती से प्यार तक सब इस क़दर अच्छा लगा आप से तुम तुम से तू तक का सफ़र अच्छा लगा इक तेरे झुमके क़यामत और डिंपल गाल के देखना साड़ी में तुझ को आँख भर अच्छा लगा ख़्वाब में भी ख़्वाब देखा तू है मेरे साथ में क्या बताएँ साथ तेरा किस क़दर अच्छा लगा प्यार ही तो याद रखने का ज़री'आ है यहाँ कौन किस को बे-सबब यूँँ उम्र भर अच्छा लगा जो परिंदे आसमाँ में उड़ रहे थे अब तलक शाम होते ही उन्हें फिर से शजर अच्छा लगा जो अकेला छोड़कर मुझ को गया था एक दिन फिर वो मेरे पास आया लौट कर अच्छा लगा शा'इरी सुनके ही डीएम कर रही हैं लड़कियाँ पूछता 'अरहत' है क्या मैं इस क़दर अच्छा लगा — Prashant Arahat

Nazm

यतीम आँखें हमारी आँखें न जाने कब से ये मुंतज़िर हैं इसी तरह से अभी तलक है इन्हें भरोसा कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं मगर करूँँ क्या यतीम आँखें ये बेसहारा कोई भी इनका यहाँ नहीं है है इन की ख़्वाहिश वो एक चेहरा जो सब सेे प्यारा जो मन को भाए जो दिल को दिल के क़रीब लाए। मगर करूँँ क्या वो एक चेहरा कहाँ से लाऊँ ये बात अपनी जगह सही है कि कोई आँखें यतीम कैसे मगर बताऊँ तुम्हें हक़ीक़त ये कहने को हैं हमारी आँखें हमारा क्या है हमारा इन में तो कुछ नहीं है मैं ख़ुद अभी तक था यक ज़रीया जो इनको सब कुछ दिखा रहा था मगर करूँँ क्या ये बेबसी है कोई भी चेहरा कोई भी मंज़र कहीं नहीं है जो इनको भाए जो दिल को दिल के क़रीब लाए ये बात अपनी जगह सही है हमारी दुनिया बहुत से चेहरों का एक जंगल मगर ये आँखें हमारी आँखें यतीम आँखें इन्हें अँधेरा ही दिख रहा है न कोई मंज़र न कोई चेहरा न कोई जंगल न कोई सहरा हमारी आँखें ये आस में हैं ये उन की ही बस तलाश में हैं कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं अभी तलक वो हमीं से रिश्ता निभा रहे हैं वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं — Prashant Arahat
"मेरा महबूब शाइ'र है" सुना है वो सहेली को मेरी ग़ज़लें पढ़ाती है ख़ुशी से ये बताती है मेरा महबूब शाइ'र है पिरो कर लफ़्ज़ मोती से ग़ज़ल तैयार करता है वो लड़का आज भी शिद्दत से मुझ को प्यार करता है मेरी हर बात को वो नज़्म का हिस्सा बनाता है कहीं रुख़सार मेरे या कहीं चश्मा बनाता है कभी वो पूछता है क्या तेरे गालों में डिंपल है वो शाइ'र है बहुत अच्छा मगर थोड़ा सा पागल है सुना है इब्तिदा-ए-इश्क़ से ले कर अभी तक की अधूरे प्यार की पूरी कहानी लिख रहा है वो अजब है कैफ़ियत उस की अजब अंदाज़ हैं उस के वो मिलता है तो बातों में ही दिन से रात करता है कहा उस ने सहेली से कि उस की नौकरी हो तो ये मुमकिन है कि घर वाले भी हों तैयार शादी को ये फ़नकारी पे हावी हो गई है नौकरी जब से मैं घर में कह नहीं सकती मेरा महबूब शाइ'र है सुना है वो दु'आओं में हमेशा ये ही कहती है ख़ुदावंद ऐ, मैं तेरी रहमतों पर नाज़ करती हूँ मेरे आशिक़ मेरे शाइ'र पे इतनी मेहरबानी कर उसे तू एक अच्छी सी अता अब नौकरी कर दे — Prashant Arahat
"वफ़ा किस सेे बता तू ने निभाई" तेरी आँखों का पानी मर गया है तभी ग़ायब तेरी शर्म-ओ-हया है ख़फ़ा थी हम सेे तू हम ने ये माना तभी तू ने नया ढूँढा ठिकाना बढ़ाई ग़ैर से भी आशनाई मगर उस सेे भी की है बे-वफ़ाई तुझे देवी के जैसे पूजते थे तेरी आँखों से दुनिया देखते थे मगर जाने तुझे क्या हो गया उफ़ मोहब्बत में हमें धोखा दिया उफ़ इमारत प्यार की तू ने बनाई बता क्यूँ अपने ही हाथों से ढाई न जाने क्या सभी से चाहती है तभी तू दिल को ऐसे तोड़ती है करेंगे ख़ुद-कुशी ये सोचती है यही जा कर सभी से बोलती है सभी से की है तू ने बे-वफ़ाई वफ़ा किस से बता तू ने निभाई किया जो काम था वो सोच लेती तू अपने नाम को ही देख लेती वफ़ा ता-उम्र हम तुझ सेे निभाते तेरी हम माँग मोती से सजाते न तू हम को मगर पहचान पाई हमारे साथ की बस बे-वफ़ाई — Prashant Arahat
"दुल्हन" मैं तुम को ये बताना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ मेरी बातों पे थोड़ा ध्यान दीजो मैं तुम को क्या बताना चाहता हूँ तुम्हीं से दिलकशी है उंस भी है मुहब्बत को बढ़ाना चाहता हूँ अक़ीदत को इबादत ही समझकर जुनूँ के पार जाना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ सभी बातों को मेरी सच न मानो मैं थोड़ा सच छुपाना चाहता हूँ यहाँ मैं रह नहीं सकता अकेले तभी मैं भी ठिकाना चाहता हूँ लगेगी किस तरह जोड़ी हमारी मैं तुम सेे राय लेना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ तेरे क़दमों में ही ख़ुशियाँ बिछाकर मैं दुनिया को दिखाना चाहता हूँ जो मर्ज़ी हो तुम्हारी तो सही है तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ तुम्हारे दिल तुम्हारे शहर में ही ओ जानेमन ठिकाना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ मैं तुम को ये बताना चाहता हूँ — Prashant Arahat