Parvez Zaami

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Parvez Zaami shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Parvez Zaami's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं तो मुश्ताक़ हूँ उस दिन का अज़ल से 'ज़ामी' कब बपा हश्र हो कब उन का मैं जल्वा देखूँ — Parvez Zaami
ज़िंदगी नाम है अज़िय्यत का ज़ीस्त में ग़म नहीं तो कुछ भी नहीं — Parvez Zaami
आबरू बज़्म की हमीं से है बज़्म में हम नहीं तो कुछ भी नहीं — Parvez Zaami
आ गया ख़ुदा का ख़त 'ज़ामी' की ज़रूरत है — Parvez Zaami
साग़र-ए-मय नहीं है हाथों में हाथ में क़ायनात है साक़ी — Parvez Zaami
सोचता हूँ तिरे अलावा तो ये क़लम मुझ से रूठ जाती है — Parvez Zaami
जिन की मंज़िल गुलाब होती है उन की राहों में ख़ार होते हैं — Parvez Zaami
कहते हैं लोग जिस को सनम बादा-ए-इरम वो तो तिरे लबों की हलावत का नाम है — Parvez Zaami
महताब तेरे रुख़ की ज़ियारत का नाम है सिंदूर तेरी माँग का उल्फ़त का नाम है — Parvez Zaami
चश्म-ए-बद-बीन से न देख हमें यार उल्फ़त-शिआर हैं हम लोग — Parvez Zaami
जानाँ अफ़सोस मेरी मय्यत पर थोड़ा सा तो जता दिया होता — Parvez Zaami
दुनिया कितनी ही ख़ूब-सूरत हो आप बाहम नहीं तो कुछ भी नहीं — Parvez Zaami
तुम को मैं बा-ख़िरद समझता था तुम तो अच्छा सा मशवरा देते — Parvez Zaami
मुस्कुरा के तू गर पिलाए तो एक क़तरा फ़ुरात है साक़ी — Parvez Zaami
आप की इल्तिफ़ात है साक़ी रक़्स में जो हयात है साक़ी — Parvez Zaami
शे'र अपने मक़ाम तक जाते आप गर मुस्कुरा दिए होते — Parvez Zaami
जब तलक सूरज को ग्रहण लगे 'ज़ामी' चाँद का क़िस्सा सुनाओ अँधेरा है — Parvez Zaami
पूछेगा मुझ से गर कोई बारे में इश्क़ के कह दूँगा साफ़-साफ़ मुसीबत का नाम है — Parvez Zaami
इक हमीं तो हैं दीद के क़ाबिल तू हमीं से नज़र चुराती है — Parvez Zaami
अपने खूँ से चमन को सींचा है फिर भी बे-एतिबार हैं हम लोग — Parvez Zaami

Ghazal

चंद लम्हों की इक़ामत सी होती है दुनिया इक वक़्ती सुकूनत सी होती है आप जब हँसते हैं दौरान-ए-गुफ़्तुगू ख़ाना-ए-दिल में मसर्रत सी होती है वो लतीफ़े भी सुनाते हैं इस तरह जिस तरह वाज़-ओ-नसीहत सी होती है जब भी सुनता हूँ फ़साना अय्यूब का मुफ़्लिसी में भी क़नाअ'त सी होती है आप के रू-ए-दरख़्शाँ को देख कर माह-ए-कामिल को भी हैरत सी होती है ये भी इक तश्ख़ीस है मरज़-ए-इश्क़ की दर्द में भी एक लज़्ज़त सी होती है पहले होती थी मोहब्बत भी कोई शय अब तो जिस्मों की तिजारत सी होती है ज़ख़्म भी उस के दिए ऐसे लगते हैं 'ज़ामी' जैसे कोई नेमत सी होती है — Parvez Zaami
महताब तेरे रुख़ की ज़ियारत का नाम है सिंदूर तेरी माँग का उल्फ़त का नाम है तकलीफ़ दे रही है मुझे बे-रुख़ी तिरी नज़रें चुराना तेरा अज़िय्यत का नाम है वल्लाह पास कुछ भी नहीं ख़ार के सिवा जो आप माँगते हैं वो निकहत का नाम है कहते हैं लोग जिस को सनम बादा-ए-इरम वो तो तिरे लबों की हलावत का नाम है मुरझा गए हैं फूल याँ अहद-ए-बहार में कश्मीर की सुना था ये जन्नत का नाम है पूछेगा मुझ से गर कोई बारे में इश्क़ के कह दूँगा साफ़-साफ़ मुसीबत का नाम है तुम से ये किस ने कह दिया फुर्क़त-ज़दा हूँ मैं 'ज़ामी' तो मेरी जान मसर्रत का नाम है — Parvez Zaami
कीजिए जो सितम रह गए हैं और दो चार दम रह गए हैं कर के वादा-ए-शब वो न आए तारे ही गिनते हम रह गए हैं कहने को नेक अब इस जहाँ में सिर्फ़ अहल-ए-अदम रह गए हैं देख कर उस की तर्ज़-ए-तबस्सुम शीश फूलों के ख़म रह गए हैं आप और बे-वफ़ा बंदा-पर्वर टूट कर सब भरम रह गए हैं ज़ोर-ए-हैदर न सिद्क़-ए-अबूज़र क्या मुसलमान हम रह गए हैं दिन को दिन शब को शब लिखने वाले चंद अहल-ए-क़लम रह गए हैं क्यूँँ नहीं उगता पच्छिम से सूरज होने को क्या सितम रह गए हैं आएँ हैं वक़्त-ए-आख़िर वो मिलने जाने अब क्या सितम रह गए हैं छेड़ कर क़िस्सा-ए-इश्क़ 'ज़ामी' बैठे गुम-सुम से हम रह गए हैं — Parvez Zaami
जो कलेजे के पार होते हैं वो अज़ीज़ों के वार होते हैं लोग जो दिल-फ़िगार होते हैं ख़ुद-कुशी का शिकार होते हैं जिन की मंज़िल गुलाब होती है उन की राहों में ख़ार होते हैं जो मोहब्बत-शिआर होते हैं हर-घड़ी ख़ुश-गवार होते हैं प्यार तो एक बार होता है हादसे बार-बार होते हैं पत्थरों को ख़ुदा बना दे जो ऐसे भी दस्तकार होते हैं इन फ़क़ीरों के हाल पर मत जा ये बड़े मालदार होते हैं आँख हम अपनी बंद कर लेंगे आप क्यूँँ शर्मसार होते हैं जो समझते हैं ख़ुद को दानिश-वर वो असल में गँवार होते हैं जिन को आती नहीं अदाकारी हम तो उन में शुमार होते हैं हम क़लंदर-मिज़ाज हैं 'ज़ामी' हम कनाअत-शिआर होते हैं — Parvez Zaami