मैं तो मुश्ताक़ हूँ उस दिन का अज़ल से 'ज़ामी'
कब बपा हश्र हो कब उन का मैं जल्वा देखूँ
महताब तेरे रुख़ की ज़ियारत का नाम है
सिंदूर तेरी माँग का उल्फ़त का नाम है
तकलीफ़ दे रही है मुझे बे-रुख़ी तिरी
नज़रें चुराना तेरा अज़िय्यत का नाम है
वल्लाह पास कुछ भी नहीं ख़ार के सिवा
जो आप माँगते हैं वो निकहत का नाम है
कहते हैं लोग जिस को सनम बादा-ए-इरम
वो तो तिरे लबों की हलावत का नाम है
मुरझा गए हैं फूल याँ अहद-ए-बहार में
कश्मीर की सुना था ये जन्नत का नाम है
पूछेगा मुझ से गर कोई बारे में इश्क़ के
कह दूँगा साफ़-साफ़ मुसीबत का नाम है
तुम से ये किसने कह दिया फुर्क़त-ज़दा हूँ मैं
'ज़ामी' तो मेरी जान मसर्रत का नाम है
शमीम-ए-हैदर अली क़लंदर
तू बंदा पर्वर अली क़लंदर
सवाली जाते हैं झोली भर कर
करम का मेहवर अली क़लंदर
न औरों के दर से माँगते हैं
तिरे गदागर अली क़लंदर
वफ़ा-शिआरी तुझी से सीखी
वफ़ा का पैकर अली क़लंदर
पियासे आए हैं तिरे दर पर
पिलाओ कौसर अली क़लंदर
ये शान तेरी के तूने पाई
वसी-मोअत्तर अली क़लंदर
बदल दे 'ज़ामी' का तू मुक़द्दर
निगाह-ए-मेहर अली क़लंदर