Akhtar Usman

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@akhtar-usman

Akhtar Usman shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhtar Usman's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

शाम आए और घर के लिए दिल मचल उठे शाम आए और दिल के लिए कोई घर न हो — Akhtar Usman
ये सोचना कि वो मुड़ मुड़ के देखती होगी और उस के बा'द ख़ुद अपने ख़याल पर हँसना — Akhtar Usman
ये काएनात मेरे सामने है मिस्ल-ए-बिसात कहीं जुनूँ में उलट दूँ न इस जहान को मैं — Akhtar Usman
चेहरे पे साए में भी ख़राशें दिखाई दें आईना-ए-हयात पे इतनी नज़र न हो — Akhtar Usman

Ghazal

वो बज़्म कौन सी है कि ज़ेर-ओ-ज़बर न हो दिल में तनाब-ए-ख़ैमा-ए-लैला तो वरना हो ये कार-ए-इश्क़ भी है अजब कार-ए-ना-तमाम समझें कि हो रहा है मगर उम्र भर न हो चेहरे पे साए में भी ख़राशें दिखाई दें आईना-ए-हयात पे इतनी नज़र न हो दोनों तरफ़ का शोर बराबर सुनाई दे दोनों तरफ़ किसी को किसी की ख़बर न हो इक दश्त-ए-बे-दिली में लहू बोलने लगे ऐसे में एक ख़्वाब कि तू हो मगर न हो इक आस्ताँ कि जिस पे अबद तक पड़े रहें इक गुलसिताँ कि जिस में सबा का गुज़र न हो इक लम्हा-ए-कमाल कि सदियों पे फैल जाए इक लहज़ा-ए-विसाल मगर मुख़्तसर न हो इक याद-ए-ख़ुश-जमाल जबाज़-ए-हयात है इक महवर-ए-ख़याल है ये भी अगर न हो इक लफ़्ज़ जिस की लौ में दमकता रहे दिमाग़ इक शे'र जिस की गूँज कहीं पेश-तर न हो इक बात की चढ़ाई कि दम टूटने लगें कहने का शौक़ हो मगर इतना हुनर न हो मिट्टी तग़ारचों में पड़ी सूखती रहे पैकर तराशने के लिए कूज़ा-गर न हो ऐसा भी क्या कि याद लहू में घुली रहे ऐसा भी क्या कि उम्र-ए-गुज़श्ता बसर न हो यूँ ख़त्त-ए-हिज्र खींचिए अपने और उस के बीच दोनों तरफ़ की साँस इधर से उधर न हो इक शाम जिस में दिल का सबूचा भरा रहे इक नाम जिस में दर्द तो हो इस क़दर न हो शाम आए और घर के लिए दिल मचल उठे शाम आए और दिल के लिए कोई घर न हो — Akhtar Usman
अभी तो पर भी नहीं तौलता उड़ान को मैं बिला-जवाज़ खटकता हूँ आसमान को मैं मुफ़ाहमत न सिखा दुश्मनों से ऐ सालार तिरी तरफ़ न कहीं मोड़ दूँ कमान को मैं मिरी तलब की कोई चीज़ शश-जिहत में नहीं हज़ार छान चुका हूँ तिरी दुकान को मैं नहीं क़ुबूल मुझे कोई भी नई हिजरत कटाऊँ क्यूँँ किसी बल्वे में ख़ानदान को मैं तुझे नख़ील-ए-फ़लक से पटख़ न दूँ आख़िर तिरे समेत गिरा ही न दूँ मचान को मैं ये काएनात मिरे सामने है मिस्ल-ए-बिसात कहीं जुनूँ में उलट दूँ न इस जहान को मैं जिसे पहुँच नहीं सकता फ़लासफ़ा का शुऊर यक़ीं के साथ मिलाता हूँ उस गुमान को मैं — Akhtar Usman